संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextॐ
श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
नारदपुराण
उत्तरभाग
महर्षि वसिष्ठका मान्धाताको एकादशीव्रतकी महिमा सुनाना
पान्तु वो जलदश्यामाः शार्ङ्गर्ज्याघातकर्कशाः।
त्रैलोक्यमण्डपस्तम्भाश्चत्वारो हरिबाहवः ॥ १ ॥
‘जो मेघके समान श्यामवर्ण हैं, शार्ङ्गधनुषकी प्रत्यञ्चाके आघात (रगड़)-से कठोर हो गयी हैं तथा त्रिभुवनरूपी विशाल भवनको खड़े रखनेके लिये मानो खंभेके समान हैं, भगवान् विष्णुकी वे चारों भुजाएँ आप लोगोंकी रक्षा करें।’
सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टमणिरञ्जितम् ।
हरिपादाम्बुजद्वन्द्वमभीष्टप्रदमस्तु नः ॥२॥
‘भगवान् श्रीहरिके वे युगल चरणारविन्द हमारे अभीष्ट मनोरथोंकी पूर्ति करें, जो देवताओं और असुरोंके मस्तकपर स्थित रत्नमय मुकुटकी घिसी हुई मणियोंसे सदा अनुरञ्जित रहते हैं।’
मान्धाताने (वसिष्ठजीसे) पूछा—द्विजोत्तम! जो भयंकर पापरूपी सूखे या गीले ईंधनको जला सके, ऐसी अग्नि कौन है? यह बतानेकी कृपा करें। ब्रह्मपुत्र! विप्रशिरोमणे! तीनों लोकोंमें त्रिविध पाप-तापके निवारणका कोई भी ऐसा सुनिश्चित उपाय नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो। अज्ञानावस्थामें किये हुए पापको ‘शुष्क’ और जान-बूझकर किये हुए पातकको ‘आर्द्र’ कहा गया है। वह भूत, वर्तमान अथवा भविष्य कैसा ही क्यों न हो, किस अग्निसे दग्ध हो सकता है? यह जानना मुझे अभीष्ट है।
वसिष्ठजी बोले—नृपश्रेष्ठ! सुनो, जिस अग्निसे ‘शुष्क’ अथवा ‘आर्द्र’ पाप पूर्णतः दग्ध हो सकता है, वह उपाय बताता हूँ। जो मनुष्य भगवान् विष्णुके दिन (एकादशी तिथि) आनेपर जितेन्द्रिय हो उपवास करके भगवान् मधुसूदनकी पूजा करता है, आँवलेसे स्नान करके रातमें जागता है, वह पापोंको धो बहा देता है। राजन्! एकादशी नामक अग्निसे, पातकरूपी ईंधन सौ वर्षोंसे संचित हो तो भी शीघ्र ही भस्म हो जाता है। नरेश्वर! मनुष्य जबतक भगवान् पद्मनाभके