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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 576 of 770

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Page 576
५७४* संक्षिप्त नारदपुराण *

दान करे। द्विजोत्तम! पहलेसे स्थापित प्रतिमाका उत्सव करके उसे जलाशयके निकट ले जाय और जलसे स्पर्श कराकर उसकी विधिपूर्वक पूजा करे। फिर उसे घरमें लाकर बायीं करवटसे सुला दे। तदनन्तर प्रातःकाल द्वादशीको गन्ध आदि उपचारोंद्वारा भगवान् वामनकी पूजा करे। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको भोजन कराकर दक्षिणा दे विदा करे। जो इस प्रकार 'पद्मा'का परम उत्तम व्रत करता है, वह इस लोकमें भोग पाकर अन्तमें इस प्रपञ्चसे मुक्त हो जाता है। आश्विन कृष्णा एकादशीको 'इन्दिरा' कहते हैं। उस दिन उपवास करके शालग्राम शिलाके सम्मुख मध्याह्नकालमें श्राद्ध करे। ब्रह्मन्! यह भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेवाला होता है। तदनन्तर द्वादशीको प्रातःकाल भगवान् पद्मनाभकी पूजा करके विद्वान् पुरुष ब्राह्मणोंको भोजन करावे और दक्षिणा देकर उन्हें विदा करनेके पश्चात् स्वयं भी भोजन करे। इस प्रकार 'इन्दिरा एकादशी'का व्रत करनेवाला मनुष्य इस लोकमें मनोवाञ्छित भोगोंको भोगकर करोड़ों पितरोंका उद्धार करके अन्तमें भगवान् विष्णुके धाममें जाता है। विप्रवर! आश्विन शुक्ला एकादशीको 'पापांकुशा' कहते हैं। उस दिन विधिपूर्वक उपवास करके द्वादशीके दिन भगवान् विष्णुकी पूजा करे। तदनन्तर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन करा उन्हें दक्षिणा दे भक्तिभावसे प्रणाम करके विदा करे। फिर स्वयं भी भोजन करे। जो मनुष्य इस प्रकार भक्तिपूर्वक पापांकुशा एकादशीका व्रत करता है, वह इस लोकमें उत्तम भोगोंको भोगकर भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है।

द्विजश्रेष्ठ! कार्तिक कृष्णपक्षमें 'रमा' नामकी एकादशीको विधिवत् स्नान करके द्वादशीको प्रातः-काल केशी दैत्यका वध करनेवाले, देवताओंके भी देवता सनातन भगवान् केशवकी पूजा करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन करावे और उन्हें दक्षिणा देकर विदा करे। इस प्रकार व्रत करके मनुष्य इस लोकमें मनोवाञ्छित भोग भोगनेके पश्चात् विमानद्वारा वैकुण्ठमें जाकर भगवान् लक्ष्मीपतिका सामीप्य लाभ करता है। कार्तिक शुक्ला एकादशीको 'प्रबोधिनी' कहते हैं। उस दिन उपवास करके रातमें सोये हुए भगवान्‌को गीत आदि माङ्गलिक उत्सवोंद्वारा जगाये। उस समय ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके विविध मन्त्रों और नाना प्रकारके वाद्योंके द्वारा भगवान्‌को जगाना चाहिये। द्राक्षा, ईख, अनार, केला और सिंघाड़ा आदि वस्तुएँ भगवान्‌को अर्पित करनी चाहिये। तत्पश्चात् रात बीतनेपर दूसरे दिन सबेरे स्नान और नित्यकर्म करके पुरुषसूक्तके मन्त्रोंद्वारा भगवान् गदादामोदरकी षोडशोपचारसे पूजा करनी चाहिये। फिर ब्राह्मणोंको भोजन करा उन्हें दक्षिणासे संतुष्ट करके विदा करे। इसके बाद आचार्यको भगवान्‌की स्वर्णमयी प्रतिमा और धेनुका दान करना चाहिये। इस प्रकार जो भक्ति और आदरपूर्वक 'प्रबोधिनी एकादशी'का व्रत करता है, वह इस लोकमें श्रेष्ठ भोगोंका उपभोग करके अन्तमें वैष्णवपद प्राप्त कर लेता है।

मार्गशीर्ष मासके कृष्णपक्षकी एकादशीको 'उत्पन्ना' एकादशी कहते हैं। उस दिन उपवास करके द्वादशीको गन्ध आदि उपचारोंसे भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करे। तत्पश्चात् श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भोजन करा उन्हें दक्षिणा दे विदा करके स्वयं भी इष्टजनोंके साथ एकाग्र होकर भोजन करे। इस प्रकार जो भक्तिभावसे 'उत्पन्ना'का व्रत करता है, वह अन्तकालमें श्रेष्ठ विमानपर बैठकर भगवान् विष्णुके लोकमें चला जाता है। मार्गशीर्ष शुक्ला एकादशीको 'मोक्षा' (मोक्षदा) एकादशी कहते हैं। उस दिन उपवास करके द्वादशीको प्रातःकाल सम्पूर्ण उपचारोंसे विश्वरूपधारी भगवान् अनन्तकी पूजा करे। फिर ब्राह्मणोंको भोजन कराये और दक्षिणा देकर विदा करनेके पश्चात् स्वयं भाई-बन्धुओंके साथ भोजन करे। इस प्रकार व्रत