संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 575 of 770
Read in context- पूर्वभाग- चतुर्थ पाद * ५७३
ऐसा करनेवाला पुरुष सम्पूर्ण दानोंका फल पाकर भगवान् विष्णुके धाममें आनन्दका अनुभव करता है। मुने! आषाढ़ शुक्ला एकादशीको उपवास करके सुन्दर मण्डप बनाकर उसमें विधिपूर्वक भगवान् विष्णुकी प्रतिमा स्थापित करे। वह प्रतिमा सोने या चाँदीकी बनी हुई अत्यन्त सुन्दर हो। उसकी चारों भुजाएँ शङ्ख, चक्र, गदा और पद्मसे सुशोभित हों। उसे पीताम्बर धारण कराया गया हो और वह अच्छी तरह बिछे हुए सुन्दर पलंगपर विराज रही हो। तदनन्तर मन्त्रपाठपूर्वक पञ्चामृत एवं शुद्ध जलसे स्नान कराकर पुरुषसूक्तके सोलह मन्त्रोंसे षोडशोपचार पूजन करे। पाद्यसमर्पणसे लेकर आरती उतारनेतक सोलह उपचार होते हैं। तत्पश्चात् श्रीहरिकी इस प्रकार प्रार्थना करे—
सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम्।
विबुद्धे त्वयि बुद्धं च जगत्सर्वं चराचरम्॥
(ना० पूर्व १२०। २३)
'जगन्नाथ! आपके सो जानेपर यह सम्पूर्ण जगत् सो जाता है और आपके जाग्रत् होनेपर यह सम्पूर्ण चराचर जगत् भी जाग्रत् रहता है।'
इस प्रकार प्रार्थना करके भक्त पुरुष चातुर्मास्यके लिये शास्त्रविहित नियमोंको यथाशक्ति ग्रहण करे। तदनन्तर द्वादशीको प्रातःकाल षोडशोपचारद्वारा भगवान् शेषशायीकी पूजा करे। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें दक्षिणासे संतुष्ट करे। फिर स्वयं भी मौनभावसे भोजन करे। इस विधिसे भगवान्की 'शयनी' एकादशीका व्रत करके मनुष्य भगवान् विष्णुकी कृपासे भोग एवं मोक्षका भागी होता है। द्विजश्रेष्ठ ! श्रावणके कृष्णपक्षमें एकादशीको 'कामिका' व्रत होता है। उस दिन श्रेष्ठ मनुष्य नियमपूर्वक उपवास करके द्वादशीको नित्यकर्मका सम्पादन करनेके अनन्तर षोडशोपचारसे भगवान् श्रीधरका पूजन करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन करा उन्हें दक्षिणा देकर विदा करनेके पश्चात् स्वयं भी भाई-बन्धुओंके साथ भोजन करे। जो इस प्रकार उत्तम 'कामिकव्रत' करता है, वह इस लोकमें सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्तकर भगवान् विष्णुके परम धाममें जाता है। श्रावण शुक्ला एकादशीको 'पुत्रदा' कहते हैं। उस दिन उपवास करके द्वादशीको नियमपूर्वक रहकर षोडशोपचारसे भगवान् जनार्दनकी पूजा करे। तदनन्तर ब्राह्मणभोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे। इस प्रकार करनेवाला इहलोकमें उनसे सद्गुणसम्पन्न पुत्र पाकर सम्पूर्ण देवताओंसे वन्दित हो साक्षात् भगवान् विष्णुके धाममें जाता है।
भाद्रपद कृष्णा एकादशीको 'अजा' कहते हैं। उस दिन उपवास करके द्वादशीके दिन विभिन्न उपचारोंसे भगवान् उपेन्द्रकी पूजा करनी चाहिये। फिर ब्राह्मणोंको मिष्टान्न भोजन कराकर दक्षिणा दे विदा करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक एकाग्रभावसे 'अजा' एकादशीका व्रत करके मनुष्य इहलोकमें सम्पूर्ण उत्तम भोगोंको भोगता और अन्तमें वैष्णवधामको जाता है। भाद्रपद शुक्ला एकादशीका नाम 'पद्मा' है। उस दिन उपवास करके नित्य पूजन करनेके अनन्तर ब्राह्मणको जलसे भरा घट