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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 466 of 770

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Page 466
४६४* संक्षिप्त नारदपुराण *

विविध मन्त्रोंद्वारा श्रीहनुमान्जीकी उपासना, दीपदानविधि और कामनानाशक भूतविद्रावण-मन्त्रोंका वर्णन

सनत्कुमारजी कहते हैं—विप्रवर! अब हनुमान्जीके मन्त्रोंका वर्णन किया जाता है, जो समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाले हैं और जिनकी आराधना करके मनुष्य हनुमान्जीके ही समान आचरणवाले हो जाते हैं। मनुस्वर (औ) तथा इन्दु (अनुस्वार)—से युक्त गगन (ह) अर्थात् 'हौं' यह प्रथम बीज है। ह् स् फ् र् और अनुस्वार ये भग (ए)—से युक्त हों अर्थात् 'हस्रैं' यह दूसरा बीज है। ख् फ् र् ये भग (ए) और इन्दु (अनुस्वार)—से युक्त हों अर्थात् 'ख्रैं' यह तीसरा बीज कहा गया है। वियत् (ह्), भृगु (स्), अग्नि (र्), मनु (औ) और इन्दु (अनुस्वार) इन सबका संयुक्त रूप 'हस्रौं' यह चौथा बीज है। भग (ए) और चन्द्र (अनुस्वार)—से युक्त वियत् (ह्) भृगु (स्) ख् फ् तथा अग्नि (र्) हों अर्थात् 'हस्ख्रैं' यह पाँचवाँ बीज है। मनु (औ) और इन्दु (अनुस्वार)—से युक्त ह् स् अर्थात् 'ह् सौं' यह छठा बीज है। तदनन्तर ङे विभक्त्यन्त हनुमत् शब्द (हनुमते) और अन्तमें हृदय (नमः) यह (हौं हस्रैं ख्रैं हस्रौं हस्ख्रैं ह्सौं हनुमते नमः) बारह अक्षरोंवाला महामन्त्रराज कहा गया है। इस मन्त्रके श्रीरामचन्द्रजी ऋषि हैं और जगती छन्द कहा गया है। इसके देवता हनुमान्जी हैं। 'ह्सौं' बीज है, 'हस्रैं' शक्ति है। छः बीजोंसे षडङ्ग-न्यास करना चाहिये। मस्तक, ललाट, दोनों नेत्र, मुख, कण्ठ, दोनों बाहु, हृदय, कुक्षि, नाभि, लिङ्ग, दोनों जानु, दोनों चरण इनमें क्रमशः मन्त्रके बारह अक्षरोंका न्यास करे। छः बीज और दो पद इन आठोंका क्रमशः मस्तक, ललाट, मुख, हृदय, नाभि, ऊरु, जङ्घा और चरणोंमें न्यास करे। तदनन्तर अञ्जनीनन्दन कपीश्वर हनुमान्जीका इस प्रकार ध्यान करे—

उद्यत्कोट्यर्कसंकाशं जगत्प्रक्षोभकारकम्।
श्रीरामाङ्घ्रिध्याननिष्ठं सुग्रीवप्रमुखार्चितम्॥
वित्रासयन्तं नादेन राक्षसान् मारुतिं भजेत्।
(९-१०)

उदयकालीन करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी हनुमान्जी सम्पूर्ण जगत्को क्षोभमें डालनेकी शक्ति रखते हैं, सुग्रीव आदि प्रमुख वानर वीर उनका समादर करते हैं। वे राघवेन्द्र श्रीरामके चरणारविन्दोंके चिन्तनमें निरन्तर संलग्न हैं और अपने सिंहनादसे सम्पूर्ण राक्षसोंको भयभीत कर रहे हैं। ऐसे पवनकुमार हनुमान्जीका भजन करना चाहिये।

इस प्रकार ध्यान करके जितेन्द्रिय पुरुष बारह हजार मन्त्र-जप करे। फिर दही, दूध और घी मिलाये हुए धानकी दशांश आहुति दे। पूर्वोक्त वैष्णवपीठपर मूलमन्त्रसे मूर्तिकी कल्पना करके उसमें हनुमान्जीका आवाहन-स्थापनपूर्वक पाद्यादि उपचारोंसे पूजन करे। केसरोंमें हृदयादि अङ्गोंकी पूजा करके अष्टदल कमलके आठ दलोंमें हनुमान्जीके निम्नाङ्कित आठ नामोंकी पूजा करे—रामभक्त, महातेजा, कपिराज, महाबल, द्रोणाद्रिहारक, मेरुपीठार्चनकारक, दक्षिणाशाभास्कर तथा सर्वविघ्नविनाशक। (रामभक्ताय नमः, महातेजसे नमः, कपिराजाय नमः, महाबलाय नमः, द्रोणाद्रिहारकाय नमः, मेरुपीठार्चनकारकाय नमः, दक्षिणाशाभास्कराय नमः, सर्वविघ्नविनाशकाय नमः) इस प्रकार नामोंकी पूजा करके दलोंके अग्रभागमें क्रमशः सुग्रीव, अङ्गद, नील, जाम्बवान्, नल, सुषेण, द्विविद तथा मैन्दकी पूजा करे। तत्पश्चात् लोकपालों तथा उनके वज्र आदि आयुधोंकी पूजा करे। ऐसा करनेसे मन्त्र सिद्ध हो जाता है। जो मानव लगातार दस दिनोंतक रातमें नौ सौ मन्त्र-जप करता है, उसके राजभय और शत्रुभय नष्ट हो जाते हैं। एक सौ आठ बार मन्त्रसे अभिमन्त्रित किया हुआ जल विषका नाश करनेवाला होता