संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 315 of 770
Read in context- पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
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राशिके समान वर्ण (गौर आदि) समझना चाहिये। एवं द्रेष्काणवश लग्न आदि भावोंसे जातकके मस्तक आदि अङ्ग-विभाग जानना चाहिये। यथा-लग्नमें प्रथम द्रेष्काण हो तो लग्न मस्तक, २।१२ नेत्र, ३।११ कान, ४।१० नाक, ५।९ कपोल, ६।८ हनु (ठुड्डी) और ७ (सप्तम) भाव मुख। द्वितीय द्रेष्काण हो तो लग्न कण्ठ, २।१२ कंधा, ३।११ पसली, ४।१० हृदय, ५।९ भुज, ६।८ पेट और ७ नाभि। तृतीय द्रेष्काण हो तो लग्न वस्ति (नाभि और लिङ्गके मध्यका स्थान), २।१२ लिङ्ग, गुदमार्ग, ३।१२ अण्डकोश, ४।१० जाँघ, ५।९ घुटना, ६।८ पिण्डली और सप्तम भाव पैर समझना चाहिये ॥९१-९३॥
जिस अङ्गकी राशिमें पापग्रह हो, उस अङ्गमें व्रण और यदि उसपर शुभ ग्रहकी दृष्टि हो तो उस अङ्गमें चिह्न (तिल मशक आदि) समझना चाहिये। पापग्रह अपनी राशि या नवमांशमें, अथवा स्थिर राशिमें हो तो जन्मके साथ ही व्रण होता है अन्यथा उस ग्रहकी दशा-अन्तर्दशामें आगे चलकर व्रण होता है। शनिके स्थानमें वात या पत्थरके आघातसे, मङ्गलके स्थानमें विष, शस्त्र और अग्निसे, बुधके स्थानमें पृथ्वी (मिट्टी)-के आघातसे, सूर्याश्रित अङ्गमें काष्ठ और पशुसे, क्षीण चन्द्राश्रित अङ्गमें सींगवाले पशु और जलचरके आघातसे व्रण होता है। जिस अङ्गकी राशिमें तीन पापग्रह हों, उस अङ्गमें निश्चितरूपसे व्रण होता ही है। षष्ठ भावमें पापग्रह हो तो उस राशिके आश्रित अङ्गमें व्रण होता है। यदि उसपर शुभग्रहकी दृष्टि हो तो उस अङ्गमें तिल या मसा होता है। यदि शुभग्रहका योग हो तो उस अङ्गमें चिह्न (दाग) मात्र होता है ॥९४-९६\frac{१}{२}॥
(ग्रहोंके स्वरूप और गुणका वर्णन-) सूर्यकी आकृति चतुरस्र* है, शरीरकी कान्ति और नेत्र पिङ्गल हैं। पित्तप्रधान प्रकृति है और उनके मस्तकपर थोड़े-से केश हैं। चन्द्रमाका आकार गोल है; उनकी प्रकृतिमें वात और कफकी प्रधानता है, वे पण्डित और मृदुभाषी हैं तथा उनके नेत्र बड़े सुन्दर हैं। मङ्गलकी दृष्टि क्रूर है, युवावस्था है, पित्तप्रधान प्रकृति है और वह चञ्चल स्वभावका है। बुधकी प्रकृतिमें कफ, पित्त और वातकी प्रधानता है, वह हास्यप्रिय और अनेकार्थक शब्द बोलनेवाला है। बृहस्पतिकी अङ्गकान्ति, केश और नेत्र पिङ्गल हैं, उनका शरीर बड़ा है, प्रकृतिमें कफकी प्रधानता है और वे बड़े बुद्धिमान् हैं। शुक्रके अङ्ग और नेत्र सुन्दर हैं, मस्तकपर काले घुँघराले केश हैं और वे सर्वदा सुखी रहनेवाले हैं। शनिका शरीर लम्बा और नेत्र कपिश वर्णके हैं, उनकी वातप्रधान प्रकृति है, उनके केश कठोर हैं और वे बड़े आलसी हैं ॥९७-१००॥
(ग्रहोंके धातु-) स्नायु (शिरा), हड्डी, शोणित, त्वचा, वीर्य, वसा और मज्जा-ये क्रमशः शनि, सूर्य, चन्द्र, बुध, शुक्र, गुरु और मङ्गलके धातु हैं ॥१०१॥
(अरिष्टकथन-) चन्द्रमा, लग्न और पापग्रह-ये राशिके अन्तिमांशमें हों अथवा चन्द्रमा और तीनों पापग्रह ये लग्नादि चारों केन्द्रोंमें हों तथा कर्क लग्न हो तो जातककी मृत्यु होती है। दो पापग्रह लग्न और सप्तम भावमें हों तथा चन्द्रमा एक पापग्रहसे युक्त हो और उसपर शुभग्रहकी दृष्टि न हो तो शिशुका शीघ्र मरण होता है ॥१०२-१०३॥ क्षीण चन्द्रमा १२ वें भावमें हो, पापग्रह लग्न और अष्टम भावमें हों तथा शुभग्रह केन्द्रमें न हों तो उत्पन्न शिशुकी मृत्यु होती है। अथवा पापयुक्त चन्द्रमा सप्तम, द्वादश या लग्नमें स्थित हो तथा उसपर केन्द्रसे भिन्नस्थानमें स्थित शुभग्रहकी दृष्टि न हो तो जातककी मृत्यु होती है। यदि चन्द्रमा ६, ८ स्थानमें रहकर पापग्रहसे
* जिसकी लम्बाई-चौड़ाई बराबर हो, वह चौकोर वस्तु 'चतुरस्र' कहलाती है।