संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context३१२ * संक्षिप्त नारदपुराण *
ही उक्त स्थानमें जन्म होता है तथा यदि लग्न-राशि अपने नवमांशमें हो तो स्वगृहमें ही वैसे स्थानमें जन्म होता है। मङ्गल और शनिसे त्रिकोण (५, ९)-में अथवा सप्तम भावमें चन्द्रमा हो तो जातकको माता त्याग देती है। यदि उसपर गुरुकी दृष्टि हो तो त्यक्त होनेपर भी दीर्घायु होता है। पापग्रहसे दृष्ट चन्द्रमा यदि लग्नमें हो और मङ्गल सप्तम भावमें स्थित हो तो मातासे त्यक्त होनेपर जातक मर जाता है। अथवा पापदृष्ट चन्द्रमा यदि शनि-मङ्गलसे ११वें भावसे स्थित हो तो भी शिशुकी मृत्यु हो जाती है। यदि चन्द्रमा शुभग्रहसे देखा जाता हो तो बालक दूसरेके हाथमें जाकर सुखी होता है। यदि पापसे ही दृष्ट हो तो दूसरेके हाथमें जानेपर भी हीनायु होता है॥ ८०-८२॥
पितृसंज्ञक ग्रह बली हो तो पिताके घरमें और मातृसंज्ञक ग्रह बली हो तो माता (अर्थात् माता) के घरमें जन्म समझना चाहिये। मुने! यदि शुभग्रह नीच स्थानमें हो तो वृक्षादिके नीचे तृण-पत्रादिकी कुटीमें जन्म समझना चाहिये। शुभग्रह नीच स्थानमें हो और लग्न अथवा चन्द्रमापर एक स्थानस्थित शुभग्रहोंकी दृष्टि न हो तो निर्जन स्थानमें प्रसव होता है। यदि चन्द्रमा शनिकी राशिके नवमांशमें स्थित होकर चतुर्थ भावमें विद्यमान हो तथा शनिसे दृष्ट या युत हो तो प्रसवकालमें 'प्रसूतिका' का शयन पृथिवीपर समझना चाहिये। शीर्षोदय राशि लग्न हो तो शिरकी ओरसे तथा पृष्ठोदय राशि लग्न हो तो पृष्ठ (पैर)-की ओरसे शिशुका जन्म होता है। चन्द्रमासे चतुर्थ स्थानमें पापग्रह हो तो माताके लिये कष्ट समझना चाहिये॥ ८३—८५ ½॥
जन्मसमयमें सब ग्रहोंकी अपेक्षा शनि बलवान् हो तो सूतिका गृह पुराना, किंतु संस्कार किया हुआ समझना चाहिये। मङ्गल बली हो तो जला हुआ, चन्द्रमा बली हो तो नया और सूर्य बली हो तो अधिक काष्ठसे युक्त होकर भी मजबूत नहीं होता। बुध बली हो तो प्रसवगृह बहुत चित्रोंसे युक्त, शुक्र बली हो तो चित्रोंसे युक्त नवीन और मनोहर तथा गुरु बली हो तो सूतिकाका गृह सुदृढ़ समझना चाहिये॥ ८६-८७॥
लग्नमें तुला, मेष, कर्क, वृश्चिक या कुम्भ हो तो (वास्तु भूमिमें) पूर्वभागमें; मिथुन, कन्या, धनु या मीन हो तो उत्तर भागमें, वृष हो तो पश्चिम भागमें तथा मकर या सिंह हो तो दक्षिण भागमें सूतिकाका घर समझना चाहिये॥ ८८॥
(गृहराशियोंके स्थान—) घरकी पूर्व आदि दिशाओंमें मेष आदि दो-दो राशियोंको और चारों कोणोंमें चारों द्विस्वभाव राशियोंको समझे। सूतिकागृहके समान ही सूतिकाके पलंगमें भी लग्न आदि भावोंको समझे। वहाँ ३, ६, ९ और १२ वें भावको क्रमशः चारों पायोंमें समझना चाहिये। चन्द्रमा और लग्नके बीचमें जितने ग्रह हों उतनी उपसूतिकाओंकी¹ प्रसवकालमें उपस्थिति समझनी चाहिये। दृश्य चक्रार्धमें (सप्तम भावसे आगे लग्नतक) जितने ग्रह हों, उतनी उपसूतिकाओंको घरसे बाहर समझे और अदृश्य चक्रार्धमें (लग्नसे आगे सप्तमपर्यन्त) जितने ग्रह हों, उतनी उपसूतिकाओंकी उपस्थिति घरके भीतर रहती है। बहुत-से आचार्यों और मुनियोंने इससे भिन्न मत प्रकट किया है। (अर्थात् दृश्य चक्रार्धमें जितने ग्रह हों उतनी उपसूतिकाओंको घरके भीतर तथा अदृश्य चक्रार्धमें जितने ग्रह हों, उतनीको घरके बाहर कहा है) ॥² ८९-९०॥
लग्नमें जो नवमांश हो, उसके स्वामी ग्रहके सदृश अथवा जन्मसमयमें जो ग्रह सबसे बली हो, उसके समान शिशुका शरीर समझना चाहिये। इसी प्रकार चन्द्रमा जिस नवमांशमें हो उस
१. प्रसूता स्त्रीके पास रहकर उसे सहयोग देनेवाली स्त्रियोंको 'उपसूतिका' कहते हैं।
२. सप्तमसे आगे लग्नतक क्षितिजके ऊपर होनेसे दृश्य चक्रार्ध कहलाता है।