संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २२९
| ‘सह’ तथा उसके पर्यायवाची शब्दोंसे योग होनेपर तृतीया विभक्ति होती है१ (इसी प्रकार सदृशार्थक२ शब्दोंके योगमें भी तृतीया होती है)। यदि कोई विकृत अङ्ग विशेषणरूपसे प्रयुक्त हुआ हो तो उसमें भी तृतीया विभक्ति होती है३। जहाँ एक क्रियाके होते समय दूसरी क्रिया लक्षित होती हो, वहाँ सप्तमी विभक्ति होती है४। ‘स्वामी’, ‘ईश्वर’, ‘अधिपति’, ‘साक्षी’, ‘दायाद’, ‘प्रसूत’ (तथा ‘प्रतिभू’)—इन शब्दोंके योगमें सप्तमी और षष्ठी दोनों विभक्तियाँ होती हैं५। जिस समुदायमेंसे किसी एककी जाति-सम्बन्धी, गुण-सम्बन्धी, क्रिया-सम्बन्धी अथवा किसी विशेष नामवाले व्यक्तिसम्बन्धी विशेषताका निश्चय करना हो, उस समुदायबोधक शब्दमें सप्तमी और षष्ठी दोनों विभक्तियाँ होती हैं६। ‘हेतु’ शब्दका प्रयोग करके यदि हेत्वर्थका प्रकाशन किया जाय तो षष्ठी विभक्ति होती है७॥ १४-१५॥ | स्मृत्यर्थकर्मणि तथा करोतेः प्रतियत्नके।<br>हिंसार्थानां प्रयोगे च कृति कर्मणि कर्तरि ॥ १६ ॥<br>स्मरणार्थक क्रियाओंके कर्ममें शेषषष्ठी होती है८। ‘कृ’ धातुके कर्ममें भी शेषषष्ठीका विधान है। यदि प्रतियत्न (गुणाधान या संस्कार) सूचित होता हो९। ‘हिंसा’ अर्थवाले धातुओंका प्रयोग होनेपर उनके कर्ममें शेषषष्ठी होती है१०। कृदन्त शब्दका योग होनेपर कर्ता और कर्ममें षष्ठी होती है११॥ १६॥<br>न कर्तृकर्मणोः षष्ठी निष्ठादिप्रतिपादने।<br>एता वै द्विविधा ज्ञेयाः सुबादिषु विभक्तिषु।<br>भूवादिषु तिङन्तेषु लकारा दश वै स्मृताः ॥ १७॥<br>यदि निष्ठा आदिका प्रतिपादन करनेवाले प्रत्ययोंसे युक्त शब्दका प्रयोग हो तो कर्ता और कर्ममें षष्ठी नहीं होती१२। ये विभक्तियाँ दो प्रकारकी जाननी चाहिये—सुप् और तिङ्। ऊपर सुबादि विभक्तियोंके विषयमें वर्णन किया गया |
१. यथा—पुत्रेण सहागतः पिता (पुत्रके साथ पिता आया है)। यहाँ ‘सह’ के योगमें तृतीया हुई है। इसी प्रकार ‘साकम्’, ‘सार्धम्’, ‘समम्’—इन शब्दोंके योगमें भी तृतीया जाननी चाहिये। २. ‘सदृश’, ‘तुल्य’, ‘सम’, ‘निभ’, ‘सदृक्ष’, ‘नीकाश’, ‘संकाश’, ‘उपमित’ आदि शब्द सदृशार्थक हैं; इनके योगमें भी तृतीया होती है, यथा—मेघेन सदृशः श्यामो हरिः (भगवान् विष्णु मेघके समान श्याम हैं)। ३. यथा—अक्ष्णा काणः (आँखका काना), कर्णेन बधिरः (कानका बहरा), पादेन खञ्जः (पैरका लँगड़ा) इत्यादि। ४. यथा—गोषु दुह्यमानासु गतः (जब गौएँ दुही जाती थीं, उस समय गया)। ५. गवां गोषु वा स्वामी। मनुष्याणां मनुष्येषु वा ईश्वरः—इत्यादि उदाहरण हैं। ६. यथा—नृणां नृषु वा ब्राह्मणः श्रेष्ठः। गवां गोषु वा कृष्णा बहुक्षीरा। गच्छतां गच्छत्सु वा धावन् शीघ्रः। छात्राणां छात्रेषु वा। मैत्रः पटुः—ये उदाहरण हैं। ७. यथा—अन्नस्य हेतोर्वसति।
८. मातुः स्मरति, मातुः स्मरणम् आदि उदाहरण है। शेषत्वेन विवक्षित होनेपर ही षष्ठी होती है। विवक्षा न होनेपर ‘मातरं स्मरति’ इस प्रकार द्वितीया विभक्ति ही होगी। ९. उदाहरण—एधोदकस्योपस्करणम्—एधोदकस्योपस्कुरुते। १०. महर्षि पाणिनिने यहाँ—‘जासिनिप्रहणनाटक्राथपिषां हिंसायाम्’ (२।३।५६) इस सूत्रद्वारा हिंसा-अर्थमें परिगणित धातुओंको ही ग्रहण किया है। उदाहरणके लिये ‘चौरस्योज्जासनम्’ ‘चौरस्य प्रणिहननम्’ निहननम्, प्रहणनं वा। ‘ ‘चौरस्योन्नाटनम्।’ ‘चौरस्य क्राथनम्।’ ‘चौरस्य पेषणं वा।’ इत्यादि प्रयोग हैं। ११. यथा—‘कृष्णस्य कृतिः’ यहाँ ‘कृष्ण’ कर्ता है, उसमें षष्ठी हुई है। ‘जगतः कर्ता कृष्णः’ इसमें ‘जगत्’ कर्म है, यहाँ कर्ममें षष्ठी हुई है। १२. आदि पदसे ‘न लोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतृनाम्’ (पा० सू० २।३।६९) इस सूत्रमें निर्दिष्ट स्थलोंको ग्रहण करना चाहिये। निष्ठाका उदाहरण यह है—‘विष्णुना हता दैत्याः’ (विष्णुसे दैत्य मारे गये)। ‘दैत्यान् हत्वान् विष्णुः’ (दैत्योंको विष्णुने मारा)। इसमें कृदन्त शब्दका योग होनेसे विष्णुशब्दमें षष्ठीकी प्राप्ति थी, जो इस निषेधसे बाधित हो गयी।