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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 230 of 770

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Page 230

२२८ * संक्षिप्त नारदपुराण *

इन सबकी अभिव्यक्तिके लिये प्रयुक्त हुए प्रति, परि, अनु—इन अव्ययोंकी 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञा होती है। 'भाग' अर्थको छोड़कर शेष जो लक्षण आदि अर्थ हैं, उनकी अभिव्यक्तिके लिये प्रयुक्त होनेवाला 'अभि१' अव्यय भी 'कर्मप्रवचनीय' होता है। हीन२ अर्थको प्रकाशित करनेवाला 'अनु' तथा 'हीन' और 'अधिक३' अर्थोंको प्रकट करनेके लिये प्रयुक्त 'उप' अव्यय भी 'कर्मप्रवचनीय' होते हैं। अन्तर अर्थात् मध्य४ अर्थ तथा सहार्थ यानी तृतीया५ विभक्तिका अर्थ व्यक्त करनेके लिये प्रयुक्त हुआ 'अनु' शब्द भी 'कर्मप्रवचनीय' है। (इन सबके योगमें द्वितीया विभक्ति होती है) ॥ ११ ॥

द्वितीया च चतुर्थी स्याच्चेष्टायां गतिकर्मणि।
अप्राणिषु विभक्ती द्वे मन्यकर्मण्यनादरे ॥ १२ ॥

गत्यर्थक६ धातुओंके कर्ममें द्वितीया और चतुर्थी दोनों विभक्तियाँ प्रयुक्त होती हैं, यदि गमनकी चेष्टा प्रकट होती हो। (परंतु मार्ग या उसका वाचक शब्द यदि गत्यर्थक धातुका कर्म हो तो उसमें चतुर्थी नहीं होती, केवल द्वितीया होती है७। यह चतुर्थीका निषेध तभी लागू होता है, जब पथिक मार्गपर चल रहा हो। यदि वह गलत रास्तेसे जाकर अच्छा रास्ता पकड़ना चाहता हो तब चतुर्थीका प्रयोग भी हो ही सकता है८) ज्ञानार्थक 'मन्' धातुका कर्म यदि कोई प्राणिभिन्न वस्तु हो और अनादर अर्थ प्रकट करना हो तो उसमें भी द्वितीया और चतुर्थी दोनों विभक्तियाँ होती हैं९ ॥ १२ ॥

नमःस्वस्तिस्वाहास्वधालंवषड्योग ईरिता।
चतुर्थी चैव तादर्थ्ये तुमर्थाद्भाववाचिनः ॥ १३ ॥

नमः, स्वस्ति, स्वधा, स्वाहा, अलम्, वषट्— इन सब अव्यय शब्दोंके योगमें चतुर्थी विभक्तिके प्रयोगका विधान है१०। तादर्थ्यमें अर्थात् जिस वस्तुके लिये कोई कार्य किया जाता है, उस 'वस्तु'के बोधक शब्दमें चतुर्थी विभक्ति होती है११। 'तुमुन्' के अर्थमें प्रयुक्त अव्ययभिन्न भावार्थक प्रत्ययान्त शब्दमें भी चतुर्थी विभक्तिका ही प्रयोग होना चाहिये१२ ॥ १३ ॥

तृतीया सहयोगे स्यात्कुत्सितेऽङ्गे विशेषणे।
काले भावे सप्तमी स्यादेतैर्योगे च षष्ठ्यपि ॥ १४ ॥
स्वामीश्वराधिपतिभिः साक्षिदायादसूत्कैः।
निर्धारणे द्वे विभक्ती षष्ठी हेतुप्रयोगके ॥ १५॥


ग्रहण किया गया है। उसका अर्थ है व्याप्ति। उदाहरण है—'वृक्षं वृक्षं प्रति सिञ्चति' (एक-एक पेड़को सींचता है), 'परि सिञ्चति, अनु सिञ्चति' का भी प्रयोग हो सकता है। १.उदाहरण—हरिमभि वर्तते। २. 'अनु हरिं सुराः' इसका अर्थ है—दैत्य भगवान्‌से हीन हैं। ३. 'अधिक' अर्थमें जहाँ 'उप' है, वहाँ सप्तमी विभक्ति होती है। 'हीन' अर्थमें जहाँ 'उप' है, उसके योगमें द्वितीया होती है। यथा—'उप हरिं सुराः'—'देवता भगवान्‌से हीन हैं। ४.उदाहरण—'हृदयमनु हरिः' भगवान् हृदयके भीतर हैं। ५.उदाहरण—नदीमन्ववसिता सेना। नद्या सह सम्बद्धेत्यर्थः (सेना नदीसे सम्बद्ध है)। ६.उदाहरण—'ग्रामं ग्रामाय वा गच्छति' (गाँवको जाता है)
७. यथा—'पन्थानं गच्छति' (राह चलता है)। ८. यथा—'उत्पथेन पथे गच्छति' (अच्छी राह पकड़नेके लिये बुरे रास्तेसे जाता है)। ९. यथा—'न त्वां तृणं मन्ये, तृणाय वा' (मैं तुझे तृणके बराबर भी नहीं समझता)। वार्तिककारके मतमें यहाँ 'प्राणिभिन्न' को हटाकर 'नौका, अन्न, शुक, शृगाल—इन शब्दोंको छोड़कर' इतना बढ़ा देना चाहिये। इससे 'न त्वाम् अन्नं मन्ये' इत्यादि स्थलोंमें प्राणिभिन्न होनेपर भी चतुर्थी नहीं होगी और 'न त्वां शुने मन्ये' इत्यादि स्थलोंमें 'प्राणी' होनेपर भी चतुर्थी हो जायगी। १०. क्रमशः उदाहरण इस प्रकार हैं—'हरये नमः। स्वस्ति प्रजाभ्यः। अग्नये स्वाहा। पितृभ्यः स्वधा। अलं मल्लो मल्लाय। वषट् इन्द्राय। ११. यथा—'मुक्तये हरिं भजति (मोक्षके लिये भगवान्‌का भजन करता है)। १२. यागाय याति—यष्टुं यातीत्यर्थः (यज्ञके लिये जाता है)।