संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * १८९
विष्णुका साकाररूप होता है। योगवेत्ता पुरुष प्रत्याहारका अभ्यास (इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे समेटकर अपने भीतर लानेका प्रयत्न) करते हुए शब्दादि विषयोंमें अनुरक्त हुई इन्द्रियोंको रोककर उन्हें अपने चित्तकी अनुगामिनी बनावे। ऐसा करनेसे अत्यन्त चञ्चल इन्द्रियाँ भलीभाँति वशमें हो जाती हैं। यदि इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं तो कोई योगी उसके द्वारा योगका साधन नहीं कर सकता। प्राणायामसे प्राण-अपानरूप वायु और प्रत्याहारसे इन्द्रियोंको अपने वशमें करके चित्तको उसके शुभ आश्रयमें स्थिर करे।
खाण्डिक्यने पूछा—महाभाग! बताइये, चित्तका वह शुभ आश्रय क्या है, जिसका अवलम्बन करके वह सम्पूर्ण दोषोंकी उत्पत्तिको नष्ट कर देता है।
केशिध्वजने कहा—राजन्! चित्तका आश्रय ब्रह्म है। उसके दो स्वरूप हैं—मूर्त और अमूर्त अथवा अपर और पर। भूपाल! संसारमें तीन प्रकारकी भावनाएँ हैं और उन भावनाओंके कारण यह जगत् तीन प्रकारका कहा जाता है। पहली भावनाका नाम 'कर्मभावना' है, दूसरीका 'ब्रह्मभावना' है और तीसरीका 'उभयात्मिका भावना' है। इनमेंसे पहलीमें कर्मकी भावना होनेके कारण वह 'कर्मभावात्मिका' है, दूसरीमें ब्रह्मकी भावना होनेसे वह 'ब्रह्मभावात्मिका' कहलाती है और तीसरीमें दोनों प्रकारकी भावना होनेसे उसको 'उभयात्मिका' कहते हैं। इस तरह तीन प्रकारकी भावात्मक भावनाएँ हैं। ज्ञानी नरेश! सनक आदि सिद्ध पुरुष सदा ब्रह्मभावनासे युक्त होते हैं। उनसे भिन्न जो देवताओंसे लेकर स्थावर-जङ्गमपर्यन्त सम्पूर्ण प्राणी हैं, वे कर्मभावनासे युक्त होते हैं। हिरण्यगर्भ, प्रजापति आदि सच्चिदानन्द ब्रह्मका बोध और सृष्टिरचनादि कर्मोंका अधिकार—दोनोंसे युक्त हैं; अतः उनमें ब्रह्मभावना एवं कर्मभावना दोनोंकी ही उपलब्धि होती है।
राजन्! जबतक विशेष भेदज्ञानके हेतुभूत सम्पूर्ण कर्म क्षीण नहीं हो जाते, तभीतक भेददर्शी मनुष्योंकी दृष्टिमें यह विश्व तथा परब्रह्म भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं। जहाँ सम्पूर्ण भेदोंका अभाव हो जाता है, जो केवल सत् है और वाणीका अविषय है तथा जो स्वयं ही अनुभवस्वरूप है, वही ब्रह्मज्ञान कहा गया है*। वही अजन्मा एवं निराकार विष्णुका परम स्वरूप है, जो उनके विश्वरूपसे सर्वथा विलक्षण है। राजन्! योगका साधक पहले उस निर्विशेष स्वरूपका चिन्तन नहीं कर सकता, इसलिये उसे श्रीहरिके विश्वमय स्थूलरूपका ही चिन्तन करना चाहिये। भगवान् हिरण्यगर्भ, इन्द्र, प्रजापति, मरुद्गण, वसु, रुद्र, सूर्य, तारे, ग्रह,गन्धर्व, यक्ष और दैत्य आदि समस्त देव-योनियाँ; मनुष्य, पशु, पर्वत, समुद्र, नदी, वृक्ष, सम्पूर्ण भूत तथा प्रधानसे लेकर विशेषपर्यन्त उन भूतोंके कारण तथा चेतन-अचेतन, एक पैर, दो पैर और अनेक पैरवाले जीव तथा बिना पैरवाले प्राणी—ये सब भगवान् विष्णुके त्रिविध भावनात्मक मूर्तरूप हैं। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् परब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णुका उनकी शक्तिसे सम्पन्न 'विश्व' नामक रूप है।
शक्ति तीन प्रकारकी बतलायी गयी है—परा, अपरा और कर्मशक्ति। भगवान् विष्णुको 'पराशक्ति'
* अक्षीणेषु समस्तेषु विशेषज्ञानकर्मसु। विश्वमेतत्परं चान्यद् भेदभिन्नदृशां नृप॥
प्रत्यस्तमितभेदं यत् सत्तामात्रमगोचरम्। वचसामात्मसंवेद्यं तज्ज्ञानं ब्रह्मसंज्ञितम्॥
(ना० पूर्व० ४७। २७-२८)