संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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विषयोंसे दूर हटकर वही मोक्षका साधक बन जाता है१। अतः विवेकज्ञानसम्पन्न विद्वान् पुरुष मनको विषयोंसे हटाकर परमेश्वरका चिन्तन करे। जैसे चुम्बक अपनी शक्तिसे लोहेको खींचकर अपनेमें संयुक्त कर लेता है, उसी प्रकार ब्रह्मचिन्तन करनेवाले मुनिके चित्तको परमात्मा अपने स्वरूपमें लीन कर लेता है। आत्मज्ञानके उपायभूत जो यम-नियम आदि साधन हैं, उनकी अपेक्षा रखनेवाली जो मनकी विशिष्ट गति है, उसका ब्रह्मके साथ संयोग होना ही 'योग' कहलाता है। जिसका योग इस प्रकारकी विशेषतावाले धर्मसे युक्त होता है, वह योगी 'मुमुक्षु' कहलाता है। पहले-पहल योगका अभ्यास करनेवाला योगी 'युञ्जान' कहलाता है। और जब उसे परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है, तब वह 'विनिष्पन्नसमाधि' (युक्त) कहलाता है। यदि किसी विघ्नदोषसे उस पूर्वोक्त योगी (युञ्जान)-का चित्त दूषित हो जाता है तो दूसरे जन्मोंमें उस योगभ्रष्टकी अभ्यास करते रहनेसे मुक्ति हो जाती है। 'विनिष्पन्नसमाधि' योगी योगकी अग्निसे अपनी सम्पूर्ण कर्मराशिको भस्म कर डालता है। इसलिये उसी जन्ममें शीघ्र मुक्ति प्राप्त कर लेता है। योगीको चाहिये कि वह अपने चित्तको योगसाधनके योग्य बनाते हुए ब्रह्मचर्य, अहिंसा, सत्य, अस्तेय तथा अपरिग्रहका निष्कामभावसे सेवन करे। ये पाँच यम हैं। इनके साथ शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा परब्रह्म परमात्मामें मनको लगाना—इन पाँच नियमोंका पालन करे। इस प्रकार ये पाँच यम और पाँच नियम बताये गये हैं। सकामभावसे इनका सेवन किया जाय तो ये विशिष्ट फल देनेवाले होते हैं और निष्कामभावसे किया जाय तो मोक्ष प्रदान करते हैं।
यत्नशील साधकको उचित है कि स्वस्तिक, सिद्ध, पद्म आदि आसनोंमेंसे किसी एकका आश्रय ले यम और नियम नामक गुणोंसे सम्पन्न हो नियमपूर्वक योगाभ्यास करे। अभ्याससे साधक जो प्राणवायुको वशमें करता है, उस क्रियाको प्राणायाम समझना चाहिये। उसके दो भेद हैं—सबीज और निर्बीज (जिसमें भगवान्के नाम और रूपका आलम्बन हो, वह सबीज प्राणायाम है और जिसमें ऐसा कोई आलम्बन नहीं है, वह निर्बीज प्राणायाम कहलाता है)। साधु पुरुषोंके उपदेशसे प्राणायामका साधन करते समय जब योगीके प्राण और अपान एक दूसरेका पराभव करते (दबाते) हैं, तब क्रमशः रेचक और पूरक नामक दो प्राणायाम होते हैं और इन दोनोंका एक ही समय संयम (निरोध) करनेसे कुम्भक नामक तीसरा प्राणायाम होता है२। राजन्! जब योगी सबीज प्राणायामका अभ्यास करता है, तब उसका आलम्बन सर्वव्यापी अनन्तरूप भगवान्
१. मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। बन्धस्य विषयासङ्गि मुक्तेर्निर्विषयं तथा।
(ना० पूर्व० ४७।४)
२. प्राणायामके तीन अङ्ग हैं—पूरक, रेचक और कुम्भक। नासिकाके एक छिद्रको बंद करके दूसरेसे जो वायुको भीतर भरा जाता है, इस क्रियाको पूरक कहते हैं, इससे प्राणवायुका दबाव पड़नेसे अपानवायु नीचेकी ओर दबती है; यही प्राणके द्वारा अपानका पराभव है। जब नासिकाके दूसरे छिद्रको बंद करके पहलेसे वायुको बाहर निकाला जाता है, उसे रेचक कहते हैं। इसमें प्राणवायुके बाहर निकलनेसे अपानवायु ऊपरको उठती है, यही अपानद्वारा प्राणका पराभव है। भीतर भरी हुई वायुको जब नासिकाके दोनों छिद्र बंद करके कुछ कालतक रोका जाता है, उस समय प्राण और अपान दोनों नियत स्थान और सीमामें अवरुद्ध रहते हैं। यही इन दोनोंका संयम या निरोध है। इसीका नाम कुम्भक है।