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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished770 pages

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Page 180

१७८ * संक्षिप्त नारदपुराण *

नहीं गयी थी। वे मनुष्योंके हृदयमें अपने उपदेशद्वारा अत्यन्त दुर्लभ सनातन सुखकी प्रतिष्ठा करना चाहते थे। सांख्यके विद्वान् तो उन्हें साक्षात् प्रजापति महर्षि कपिलका ही स्वरूप समझते हैं। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो सांख्यशास्त्रके प्रवर्तक भगवान् कपिल स्वयं पञ्चशिखके रूपमें आकर लोगोंको आश्चर्यमें डाल रहे हैं। उन्हें आसुरि मुनिका प्रथम शिष्य और चिरञ्जीवी बताया जाता है। एक समय उन्होंने महर्षि कपिलके मतका अनुसरण करनेवाले मुनियोंकी विशाल मण्डलीमें जाकर सबमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित परमार्थस्वरूप अव्यक्त ब्रह्मके विषयमें निवेदन किया था और क्षेत्र तथा क्षेत्रज्ञका अन्तर स्पष्टरूपसे जान लिया था। यही नहीं, जो एकमात्र अक्षर एवं अविनाशी ब्रह्म नाना रूपोंमें दिखायी देता है, उसका ज्ञान भी आसुरिने उस मुनिमण्डलीमें प्राप्त किया था, उन्हींके शिष्य पञ्चशिख थे, जो देव-कोटिके पुरुष होते हुए भी मानवीके दूधसे पले थे। कपिला नामकी एक ब्राह्मणी थी, जो पति-पुत्र आदि कुटुम्बके साथ रहती थी; उसीके पुत्रभावको प्राप्त होकर वे उसके स्तनोंका दूध पीते थे। अतः कपिलाका दूध पीनेके कारण उनकी कापिलेय संज्ञा हुई। उन्होंने नैष्ठिक (ब्रह्ममें निष्ठा रखनेवाली) बुद्धि प्राप्त की थी। कापिलेयकी उत्पत्तिके सम्बन्धमें यह बात मुझे भगवान् ब्रह्माजीने बतायी थी। उनके कपिलापुत्र कहलाने और सर्वज्ञ होनेका यही उत्तम वृत्तान्त है। धर्मज्ञ पञ्चशिखने उत्तम ज्ञान प्राप्त किया था। वे राजा जनकको सौ आचार्योंपर समानभावसे अनुरक्त जानकर उनके दरबारमें गये। वहाँ जाकर उन्होंने अपने युक्तियुक्त वचनोंसे उन सब आचार्योंको मोहित कर दिया। उस समय महाराज जनक कपिलानन्दन पञ्चशिखका ज्ञान देखकर उनके प्रति आकृष्ट हो गये और अपने सौ आचार्योंको छोड़कर उन्हींके पीछे चलने लगे। तब मुनिवर पञ्चशिखने राजाको धर्मानुसार चरणोंमें पड़ा देख उन्हें योग्य अधिकारी मानकर परम मोक्षका उपदेश किया, जिसका सांख्य-शास्त्रमें वर्णन है। उन्होंने 'जातिनिर्वेद'¹ का वर्णन करके 'कर्मनिर्वेद'² का उपदेश किया। तत्पश्चात् 'सर्वनिर्वेद'³ की बात बतायी। उन्होंने कहा—जिसके लिये धर्मका आचरण किया जाता है, जो कर्मोंके फलका उदय होनेपर प्राप्त होता है, वह इहलोक या परलोकका भोग नश्वर है। उसपर आस्था करना उचित नहीं। वह मोहरूप चञ्चल और अस्थिर है।


१. जन्मके समय गर्भवास आदिके कारण जो कष्ट होता है, उसपर विचार करके शरीरसे वैराग्य होना 'जातिनिर्वेद' है। २. कर्मजनित क्लेश—नाना योनियोंकी प्राप्ति एवं नरकादि यातनाका विचार करके पाप तथा काम्य कर्मोंसे विरत होना 'कर्मनिर्वेद' है। ३. इस जगत्की छोटी-से-छोटी वस्तुओंसे लेकर ब्रह्मलोकतकके भोगोंकी क्षणभङ्गुरता और दुःखरूपताका विचार करके सब ओरसे विरक्त होना 'सर्वनिर्वेद' कहलाता है।