संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 179 of 770
Read in context- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * | १७७
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ओरसे चञ्चल एवं अस्थिर होती है, उसी प्रकार प्रथम ध्यानमार्गमें साधकका चित्त भी चञ्चल होता है। क्षणभरके लिये कभी एकाग्र होकर कुछ देर ध्यानमार्गमें स्थिर होता है, फिर भ्रान्त होकर वायुकी भाँति आकाशमें दौड़ लगाने लगता है। परंतु ध्यानयोगका ज्ञाता पुरुष इससे ऊबे नहीं। वह क्लेश, चिन्ता, ईर्ष्या और आलस्यका त्याग करके पुनः ध्यानके द्वारा चित्तको एकाग्र करे। प्रथम ध्यानमार्गपर चलनेवाले मुनिके हृदयमें विचार, वितर्क एवं विवेककी उत्पत्ति होती है। मन उद्विग्न होनेपर उसका समाधान करे। ध्यानयोगी मुनि कभी उससे खिन्न या उदासीन न हो। ध्यानद्वारा अपना हित-साधन अवश्य करे। इन इन्द्रियोंको धीरे-धीरे शान्त करनेका प्रयत्न करे। क्रमशः इनका उपसंहार करे। ऐसा करनेपर इनकी पूर्णरूपसे शान्ति हो जायगी। मुनीश्वर! प्रथम ध्यानमार्गमें पाँचों इन्द्रियों और मनको स्थापित करके नित्य अभ्यास करनेसे ये स्वयं शान्त हो जाते हैं। इस प्रकार आत्मसंयम करनेवाले पुरुषको जिस सुखकी प्राप्ति होती है, वह किसी लौकिक पुरुषार्थ और प्रारब्धसे नहीं मिलता। उस सुखके प्राप्त होनेपर मनुष्य ध्यानके साधनमें रम जाता है। इस प्रकार ध्यानका अभ्यास करनेवाले योगीजन निरामय मोक्षको प्राप्त होते हैं।
सनन्दनजी कहते हैं—ब्रह्मन्! महर्षि भृगुके इस प्रकार कहनेपर परम धर्मात्मा एवं प्रतापी भरद्वाज मुनि बड़े विस्मित हुए और उन्होंने भृगुजीकी बड़ी प्रशंसा की।
पञ्चशिखका राजा जनकको उपदेश
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! सनन्दनजीका मोक्षधर्मसम्बन्धी वचन सुनकर तत्त्वज्ञ नारदजीने पुनः अध्यात्मविषयक उत्तम बात पूछी।
नारदजी बोले—महाभाग! मैंने आपके बताये हुए अध्यात्म और ध्यानविषयक मोक्ष-शास्त्रको सुना, यह सब बार-बार सुननेपर भी मुझे तृप्ति नहीं हो रही है (अधिकाधिक सुननेकी इच्छा बढ़ती जा रही है)। सर्वज्ञ मुने! जीव अविद्याके बन्धनसे जिस प्रकार मुक्त होता है, वह उपाय बताइये। साधु पुरुषोंने जिसका आश्रय ले रखा है, उस मोक्ष-धर्मका पुनः वर्णन कीजिये।
सनन्दनजीने कहा—नारद! इस विषयमें विद्वान् पुरुष इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। जिससे यह ज्ञात होता है कि मिथिलानरेश जनकने किस प्रकार मोक्ष प्राप्त किया था। यह उस समयकी बात है, जब मिथिलामें जनकवंशी राजा जनदेवका राज्य था। जनदेव सदा ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाले धर्मोंका ही चिन्तन किया करते थे। उनके दरबारमें एक सौ आचार्य बराबर रहा करते थे, जो उन्हें भिन्न-भिन्न आश्रमोंके धर्मोंका उपदेश देते रहते थे। 'इस शरीरको त्याग देनेके पश्चात् जीवकी सत्ता रहती है या नहीं? अथवा देह-त्यागके बाद उसका पुनर्जन्म होता है या नहीं?' इस विषयमें उन आचार्योंका जो सुनिश्चित सिद्धान्त था, वे लोग आत्मतत्त्वके विषयमें जैसा विचार उपस्थित करते थे, उससे शास्त्रानुयायी राजा जनदेवको विशेष संतोष नहीं होता था। एक बार कपिलाके पुत्र महामुनि पञ्चशिख सम्पूर्ण पृथ्वीकी परिक्रमा करते हुए मिथिलामें आ पहुँचे। वे सम्पूर्ण संन्यास-धर्मोंके ज्ञाता और तत्त्वज्ञानके निर्णयमें एक सुनिश्चित सिद्धान्तके पोषक थे। उनके मनमें किसी प्रकारका संदेह नहीं था। वे निर्द्वन्द्व होकर विचरा करते थे। उन्हें ऋषियोंमें अद्वितीय बताया जाता है। कामना तो उन्हें छू भी