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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 173 of 770

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Page 173
  • पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
    १७१

भृगुजीने कहा—मुने! जगत्का हित-साधन करनेवाले भगवान् ब्रह्माजीने पहलेसे ही धर्मकी रक्षाके लिये चार आश्रमोंका उपदेश किया है। उनमेंसे गुरुकुलमें निवास ही पहला आश्रम बतलाया जाता है। इस आश्रममें शौच, संस्कार, नियम तथा व्रतके नियमपूर्वक पालनमें चित्त लगाकर दोनों संध्याओंके समय उपासना करनी चाहिये। सूर्यदेव तथा अग्निदेवका उपस्थान करे। आलस्य छोड़कर गुरुको प्रणाम करे। गुरुमुखसे वेदका श्रवण और अभ्यास करके अपने अन्तःकरणको पवित्र करे। तीनों समय स्नान करके ब्रह्मचर्यपालन, अग्निहोत्र तथा गुरु-शुश्रूषा करे। प्रतिदिन भिक्षा माँगे और भिक्षामें जो कुछ प्राप्त हो, वह सब गुरुके अर्पित कर दे तथा अपने अन्तरात्माको भी गुरुके चरणोंमें अर्पित कर दे। गुरुके वचन और आज्ञाका पालन करनेमें कभी प्रतिकूलता न दिखाये—सदा आज्ञापालनके लिये तैयार रहे तथा गुरुकी कृपासे प्राप्त हुए वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायमें तत्पर रहे। इस विषयमें यह उक्ति प्रसिद्ध है—जो द्विज गुरुकी आराधना करके वेदका ज्ञान प्राप्त करता है, उसे स्वर्गरूप फलकी उपलब्धि होती है और उसका सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध हो जाता है।

दूसरे आश्रमको गार्हस्थ्य कहते हैं। उसके सदाचारका जो स्वरूप है, उसकी पूर्णरूपसे व्याख्या करेंगे। जो गुरुकुलसे लौटे हुए सदाचारपरायण स्नातक हैं और धर्मानुष्ठानका फल चाहते हैं, उनके लिये गृहस्थ-आश्रमका विधान है। इसमें धर्म, अर्थ और काम—तीनोंकी प्राप्ति होती है। यहाँ त्रिवर्ग-साधनकी अपेक्षा रखकर निन्दित कर्मके परित्यागपूर्वक उत्तम (न्याययुक्त) कर्मसे धनोपार्जन करे। वेदोंके स्वाध्यायद्वारा, उपलब्ध हुई प्रतिष्ठासे अथवा ब्रह्मर्षिनिर्मित मार्गसे प्राप्त हुए धनके द्वारा या समुद्रसे उपलब्ध हुए द्रव्यद्वारा अथवा नियमोंके अभ्यास तथा देवताके कृपाप्रसादसे मिली हुई सम्पत्तिद्वारा गृहस्थ पुरुष अपनी गृहस्थी चलावे। गृहस्थ-आश्रमको सम्पूर्ण आश्रमोंका मूल कहते हैं। गुरुकुलमें निवास करनेवाले ब्रह्मचारी, संन्यासी तथा अन्य लोग जो संकलित व्रत, नियम एवं धर्मका अनुष्ठान करनेवाले हैं, उन सबका आधार गृहस्थ-आश्रम है। उनके अतिरिक्त भी गृहस्थ-आश्रममें भिक्षा और बलिवैश्व आदिका वितरण चलता रहता है। वानप्रस्थोंके लिये भी आवश्यक द्रव्य-सामग्री गृहस्थाश्रमसे ही प्राप्त होती है। प्रायः ये श्रेष्ठ पुरुष उत्तम पथ्य अन्नका सेवन करते हुए स्वाध्यायके प्रसङ्गसे अथवा तीर्थयात्राके लिये देश-दर्शनके निमित्त इस पृथ्वीपर घूमते रहते हैं। गृहस्थको उचित है कि उठकर उनकी अगवानी करे, उनके चरणोंमें मस्तक झुकाये, उनसे ईर्ष्यारहित वचन बोले, उनके लिये आवश्यक वस्तुओंका दान करे, उन्हें सुख और सत्कारपूर्वक आसन दे तथा उनके लिये सुखसे सोने और खाने-पीनेकी सुव्यवस्था करे। इस विषयमें यह उक्ति है—जिसके घरसे अतिथि निराश होकर