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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 172 of 770

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Page 172
१७०* संक्षिप्त नारदपुराण *

निभाता रहे और संग्रहका त्याग करके बुद्धिके द्वारा अपनी इन्द्रियोंको जीते। ऐसा कार्य करे जिसमें शोकके लिये स्थान न हो तथा जो इहलोक और परलोकमें भी भयदायक न हो। सदा तपस्यामें लगे रहकर इन्द्रियोंका दमन तथा मनका निग्रह करते हुए मुनिवृत्तिसे रहे। आसक्तिके जितने विषय हैं, उन सबमें अनासक्त रहे और जो किसीसे पराजित नहीं हुआ, उस परमेश्वरको जीतने (जानने या प्राप्त करने)-की इच्छा रखे। इन्द्रियोंसे जिन-जिन वस्तुओंका ग्रहण होता है, वह सब व्यक्त है। यही व्यक्तकी परिभाषा है। जो अनुमानके द्वारा कुछ-कुछ जानी जाय उस इन्द्रियातीत वस्तुको अव्यक्त जानना चाहिये। जबतक (ज्ञानकी कमीके कारण) पूरा विश्वास न हो जाय, तबतक ज्ञेयस्वरूप परमात्माका मनन करते रहना चाहिये और पूर्ण विश्वास हो जानेपर मनको उसमें लगाना चाहिये अर्थात् ध्यान करना चाहिये। प्राणायामके द्वारा मनको वशमें करे और संसारकी किसी भी वस्तुका चिन्तन न करे। ब्रह्मन् ! सत्य ही व्रत, तपस्या तथा पवित्रता है, सत्य ही प्रजाकी सृष्टि करता है। सत्यसे ही यह लोक धारण किया जाता है और सत्यसे ही मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं*। असत्य तमोगुणका स्वरूप है, तमोगुण मनुष्यको नीचे (नरकमें) ले जाता है। तमोगुणसे ग्रस्त मनुष्य अज्ञानान्धकारसे आवृत्त होनेके कारण ज्ञानमय प्रकाशको नहीं देख पाते। नरकको तम और दुष्प्रकाश कहते हैं। इहलोककी सृष्टि शारीरिक और मानसिक दुःखोंसे परिपूर्ण है। यहाँ जो सुख हैं वे भी भविष्यमें दुःखको ही लानेवाले हैं। जगत्को इन सुख-दुःखोंसे संयुक्त देखकर विद्वान् पुरुष मोहित नहीं होते। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह दुःखसे छूटनेका प्रयत्न करे। प्राणियोंको इहलोक और परलोकमें प्राप्त होनेवाला जो सुख है, वह अनित्य है। मोक्षरूपी फलसे बढ़कर कोई सुख नहीं है। अतः उसीकी अभिलाषा करनी चाहिये। धर्मके लिये जो शम-दमादि सद्गुणोंका सम्पादन किया जाता है, उसका उद्देश्य भी सुखकी प्राप्ति ही है। सुखरूप प्रयोजनकी सिद्धिके लिये ही सभी कर्मोंका आरम्भ किया जाता है। किंतु अनृत (झूठ) से तमोगुणका प्रादुर्भाव होता है। फिर उस तमोगुणसे ग्रस्त मनुष्य अधर्मके ही पीछे चलते हैं, धर्मपर नहीं चलते। वे क्रोध, लोभ, मोह, हिंसा और असत्य आदिसे आच्छादित होकर न तो इस लोकमें सुख पाते हैं, न परलोकमें ही। नाना प्रकारके रोग, व्याधि और उग्र तापसे पीड़ित होते हैं। वध, बन्धनजनित क्लेश आदिसे तथा भूख, प्यास और परिश्रमजनित संतापसे संतप्त रहते हैं। वर्षा, आँधी, अधिक गरमी और अधिक सर्दीके भयसे चिन्तित होते हैं। शारीरिक दुःखोंसे दुःखी तथा बन्धु-धन आदिके नाश अथवा वियोगसे प्राप्त होनेवाले मानसिक शोकोंसे व्याकुल रहते हैं और जरा तथा मृत्युजनित कष्टसे या अन्य इसी प्रकारके क्लेशोंसे पीडित रहा करते हैं। स्वर्गलोकमें जबतक जीव रहता है, सदा उसे सुख ही मिलता है। इस लोकमें सुख और दुःख दोनों हैं। नरकमें केवल दुःख-ही-दुःख बताया गया है। वास्तविक सुख तो वह परमपद-स्वरूप मोक्ष ही है।

भरद्वाजजी बोले- ब्रह्मर्षियोंने पूर्वकालमें जो चार आश्रमोंका विधान किया है, उन आश्रमोंके अपने-अपने आचार क्या हैं? यह बतानेकी कृपा करें।


* सत्यं व्रतं तपः शौचं सत्यं विसृजते प्रजा॥ सत्येन धार्यते लोकः स्वः सत्येनैव गच्छति।
(ना० पूर्व० ४३। ८१-८२)