प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा
इस ग्रन्थ के बारे में
'प्रेम-दर्शन' देवर्षि नारद-रचित भक्तिसूत्रों पर भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार (1892–1971) की विस्तृत हिन्दी व्याख्या है। नारद भक्तिसूत्र चौरासी सूत्रों का छोटा ग्रन्थ है, जो 'सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा' कहकर भक्ति को भगवान् के प्रति परम प्रेम के रूप में परिभाषित करता है। भाईजी 'कल्याण' पत्रिका के संस्थापक-सम्पादक और गीताप्रेस आन्दोलन के प्रमुख व्यक्ति थे।
इस पुस्तक में सूत्रों को चार प्रकरणों में समझाया गया है: पराभक्ति का स्वरूप और लक्षण; भक्ति के साधन, अहंकार-त्याग और सत्संग की महिमा; प्रेमाभक्ति की अनिर्वचनीयता और गौणी-मुख्या भक्ति का भेद; तथा ग्यारह प्रकार की आसक्तियाँ और भक्ति की श्रेष्ठता। आरम्भ में 'प्रार्थना और निवेदन', देवर्षि नारद का परिचय, प्रेमरूपा भक्ति का स्वरूप और प्रेम में अनन्यता जैसे लेख हैं। भाईजी गोपियों और सन्तों के उदाहरणों से सूत्रों का भाव खोलते हैं।
यह गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण है; इस प्रति में संवत् 2077 के चालीसवें पुनर्मुद्रण का उल्लेख है, जिससे इसकी लोकप्रियता का अनुमान होता है। लगभग 178 पृष्ठों की यह पुस्तक भक्ति-मार्ग के साधकों के लिए सरल और भावपूर्ण मार्गदर्शिका है।
१७६ प्रेम-दर्शन
य इदं नारदप्रोक्तं शिवानुशासनं विश्वसिति श्रद्धत्ते स
प्रेष्ठं लभते स प्रेष्ठं लभत इति ॥ ८४ ॥
८४-जो इस नारदोक्त शिवानुशासनमें विश्वास और
श्रद्धा करते हैं वे प्रियतमको पाते हैं, वे प्रियतमको पाते हैं।
अबतक भक्तिशास्त्रकी व्याख्या करके अब सूत्रकार उसका
फल वर्णन करते हैं। देवर्षि कहते हैं कि जो इस मेरे कहे हुए
परम कल्याणमय उपदेशपर या भक्तितत्त्वके आदि आचार्य
साक्षात् भगवान् श्रीशिवजीके किये हुए उपदेशपर विश्वास और
श्रद्धा करते हैं वे भगवान्को 'प्रियतम' रूपसे प्राप्त करते हैं।
विश्वास और श्रद्धा हुए बिना तो कुछ भी नहीं होता।
संशयात्माका तो पतन ही होता है—'संशयात्मा विनश्यति'।
फिर, विश्वास और श्रद्धा करनेसे ही उसके लिये साधन होता
है, अतएव विश्वास और श्रद्धा करके भक्ति करनी चाहिये।
अन्यान्य साधनोंद्वारा भगवान् अन्यान्य रूपोंमें प्राप्त होते हैं परन्तु
भक्तिद्वारा तो वे 'प्रियतम' रूपमें मिलते हैं। यह प्रेम ही चरम
या पंचम पुरुषार्थ है, जिसमें मोक्षका भी संन्यास हो जाता है।
यही जीवनका परम फल है।
बोलो भक्ति, भक्त और भगवान्की जय!
॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥