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सर्वकोश
प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार) द्वारा

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DevanagariHindipublished178 पृष्ठ

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पृष्ठ 167

भक्तिके प्रधान सहायक १६५
एकमात्र प्राणाराम प्रियतम प्रभुकी प्यारी पतिव्रता पत्नी बन
जाओ। इसीलिये श्रीसुन्दरदासजी महाराजने कहा है—
पतीहीसूँ प्रेम होय, पतीहीसूँ नेम होय,
पतीहीसूँ छेम होय, पतीहीसूँ रत है।
पति ही है जग्य-जोग, पति ही है रसभोग,
पतीहीसूँ मिटै सोग, पतीहीको जत है॥
पतीहीको ग्यान-ध्यान, पतीहीको पुन्न-दान,
पति ही है तीर्थस्नान, पतीहीको मत है।
पति बिनु पति नाहिं, पति बिनु गति नाहिं,
'सुन्दर' सकल बिधि, एक पतिब्रत है॥
जलको सनेही मीन बिछुरत तजै प्रान,
मनि बिनु अहि जैसे जीवत न लहिये।
स्वातिबिंदुको सनेही प्रगट जगत माँहिं,
एक सीप दूसरो सु चातकहु कहिये॥
रबिको सनेही पुनि कमल सरोवरमें,
ससिको सनेही हू चकोर जैसे रहिये।
तैसे ही 'सुन्दर' एक प्रभुसूँ सनेह जोर,
और कुछ देखि काहू ओर नाहि बहिये॥
भगवान् स्वयं आज्ञा करते हैं—
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
(गीता १८।६५-६६)