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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 166 of 178

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Page 166

१६४ प्रेम-दर्शन
सुधारसके सामने जगत्के सारे रसोंको फीका समझकर, उस
कोटि-कोटि कन्दर्पदर्पदलन, सौन्दर्यसार श्यामसुन्दरके स्वरूपके
सामने जगत्की समस्त रूपराशिको नगण्य मानकर उसीके
भजनमें लग जाओ, चित्तको उसीके अर्पण कर दो, सब प्रकारसे
उसीपर निर्भर हो जाओ, मनसे उसीका स्मरण करो, बुद्धिसे
उसीका विचार करो, वाणीसे उसीके गुणानुवाद गाओ, कानोंसे
उसीके गुण और लीलाओंको सुनो, जीभसे उसीके प्रसादका रस
लो, नासिकासे उसीकी पदपद्मपरागगन्धको सूंघो, शरीरसे सर्वत्र
उसीके स्पर्शका अनुभव करो, नेत्रोंसे उसी छविधामकी छविको
सर्वत्र-सर्वदा देखो, हाथोंसे उसीकी सेवा करो, तन-मन-धन सब
उसीके अर्पण कर दो।
जबतक तुम जगत्के पदार्थोंको अपने मानते रहोगे, उनमें
ममत्व रखोगे, तबतक कभी निश्चिन्त नहीं हो सकोगे; ये
नाशवान् क्षणभंगुर परिवर्तनशील पदार्थ कभी तुम्हें निश्चिन्त नहीं
होने देंगे, इनपरसे ममत्व और आसक्तिको हटा लो; ये जिनकी
चीजें हैं, उन्हें सौंप दो; बस, जहाँ तुमने इनको भगवान्‌के समर्पण
किया कि वहीं निश्चिन्त हो गये। फिर न नाशका भय है, न
अभावकी चिन्ता है और न कामनाकी जलन है। और जहाँ
निश्चिन्त होकर भजनमें लगे कि वहीं तुम्हें उस दिव्य आनन्द-
माधुर्य-सौन्दर्य-सागरकी झाँकी बीच-बीचमें दीखने लगेगी, फिर
तुम्हारा चित्त दूसरी ओर जाना ही नहीं चाहेगा। ऐश्वर्यकी ओर
दृष्टि ही नहीं जायगी—और कहीं ऐश्वर्यकी कोई वासना रह भी
गयी तो समस्त ऐश्वर्योंका खजाना उनके चरणोंमें ही तुम्हें मिल
जायगा। इसीलिये विषयासक्तिरूपी व्यभिचारको त्यागकर उस