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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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तथा 'यवनी' आदि शब्दों पर बड़ा ज़ोर दिया गया है कि ये यवनों अर्थात्
यूनानियों से ही लिए गए हैं। परन्तु संस्कृत नाटक में 'यवनियां' राजा
की अंग-रक्षक हैं जो कि यूनानी नाटक में नहीं हैं। और यवनिका का
अर्थ 'पर्दा' है। परन्तु यूनानी नाटक में तो पर्दा था ही नहीं। शायद
पर्दे के लिए कपड़ा विदेश से मंगाया जाता हो। और विदेशियों के
लिए भारतीय प्रायः यवन शब्द का प्रयोग करते हों। वैसे भी संस्कृत
नाटक की आत्मा यूनानी नाटकों से सर्वथा विभिन्न है। यूनानी नाटकों
में दुःखान्त और सुखान्त दोनों प्रकार के नाटक मिलते हैं। परन्तु
हमारे यहां तो ऐसा कोई झगड़ा ही नहीं। संस्कृत नाटकों में हत्या,
युद्ध आदि के दृश्य वर्जित हैं, यूनानी नाटकों में नहीं।
भारत वासियों ने तो यूनानी भाषा कभी अच्छी तरह सीखी
ही नहीं। और फिर हम ने तो उस समय भी अच्छे अच्छे नाटक
तैयार कर लिए थे जिस समय यूनानियों में नाट्य कला का विकास
अभी आरम्भ ही हुआ था। अतः सिद्ध है कि संस्कृत नाट्यकला पर
कोई यूनानी प्रभाव नहीं। ये दोनों नाट्यकलाएँ पृथक् पृथक् स्वतः
समृद्ध हुईं।
नागानन्द-कथावस्तुः—
'नागानन्द' पाञ्च अंकों का नाटक है। इस की कथा एक बौद्ध
कथा है। इस में जीमूतवाहन का आत्मत्याग दर्शाया है। नाटक की
प्रस्तावना में यह बताया है कि इस की कथा विद्याधर जातक से ली गई
है। जातकमाला में कहानी रूप में श्री बुद्ध के पूर्वजन्मों में किए गए
सत्कर्मों का वर्णन है। इस समय इस जातकमाला में 'विद्याधर जातक'
नामी कोई कहानी नहीं। सम्भवतः वह हस्तगत नहीं हुई।
यह कथा सर्व-प्रथम वृहत्कथा में मिलती है। परन्तु अब यह
ग्रन्थ भी प्राप्य नहीं है। वहां से यह कथा 'कथासरित्सागर' तथा