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सर्वकोश
मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

मुहूर्त चिन्तामणि (दैवज्ञ राम - षोडश संस्कार, यात्रा, वास्तु व गृह-प्रवेश मुहूर्त सटीक)

Muhurta Chintamani of Daivajna Rama with Commentary

दैवज्ञ राम (टीकाकार: पं. केदारदत्त जोशी) द्वारा

DevanagariHindipublished207 पृष्ठ

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पृष्ठ 18

शुभाशुभप्रकरण ९
अन्वयः—चैत्रादौ (क्रमेण) घटः, झषः, गौः, मिथुनं, मेषकन्यालितौलिनः, धनुः,
कर्कः, मृगः, सिंहः (एते) शून्यराशयः (ज्ञेयाः) ॥ १६ ॥
चैत्र में कुम्भ, वैशाख में मीन, ज्येष्ठ में वृष, आषाढ़ में मिथुन, श्रावण
में मेष, भादौं में कन्या, कुवार में वृश्चिक, कार्त्तिक में तुला, अगहन में धनु,
पौष में कर्क, माघ में मकर और फाल्गुन में सिंह शून्य है। इन लग्नों में शुभ
कार्य न करना चाहिए ॥ १६ ॥
प्रतिपदादि विषम तिथियों में दग्ध लग्नें
पक्षादितस्त्वोजतिथौ घटैणौ मृगेन्द्रनक्रौ मिथुनाङ्गने च ।
चापेन्दुभे कर्कहरी ह्यान्त्यौ गोन्त्यौ च नेष्ठे तिथिशून्यलग्ने ॥ १७ ॥
अन्वयः—पक्षादितः ओजतिथौ (क्रमेण) घटैणौ, मृगेन्द्रनक्रौ, मिथुनाङ्गने,
चापेन्दुभे, कर्कहरी, ह्यान्त्यौ, गोन्त्यौ (एते) तिथिशून्यलग्ने, नेष्टे ॥ १७ ॥
शुक्ल और कृष्ण पक्ष की विषम तिथियों में ये लग्ने दग्धसंज्ञक हैं।
प्रतिपदा में तुला और मकर, तृतीया में सिंह और मकर, पञ्चमी में मिथुन
और कन्या, सप्तमी में कर्क और धनु, नवमी में कर्क और सिंह, एकादशी में
धनु और मीन, त्रयोदशी में वृष और मीन शून्य हैं। इसलिये इनमें कोई
शुभ कार्य न करे ॥ १७ ॥
पूर्वोक्त दुष्ट योगों का परिहार
तिथयो मासशून्याश्च शून्यलग्नानि यान्यपि ।
मध्यदेशे विवर्ज्यानि न दूष्याणीतरेषु तु ॥ १८ ॥
पङ्ग्वन्धकाणलग्नानि मासशून्याश्च राशयः ।
गौडमालवयोस्त्याज्या अन्यदेशे न गर्हिताः ॥ १९ ॥
अन्वयः—मासशून्याः तिथयः अपि च (पुनः) यानि शून्यलग्नानि (तानि)
मध्यदेशे विवर्ज्यानि, इतरेषु (देवेषु) तु न दूष्याणि ॥ १८ ॥ पङ्ग्वन्धकाणलग्नानि,
मासशून्याः राशयश्च गौडमालवयोः (देशयोः) त्याज्याः, अन्यदेशें न गर्हिताः ॥ १९ ॥
मासों की शून्य तिथियाँ और शून्य लग्नें मध्यदेश में ही वर्जित हैं, अन्य
देशों में नहीं। पंगु, अन्ध और काण लग्नें तथा मासों की शून्य राशियाँ गौड़
और मालव देश में त्याज्य हैं, अन्य देशों में निन्दित नहीं हैं ॥ १८-१९ ॥
शुभ कर्मों में निषिद्ध योग।
वर्जयेत्सर्वकार्येषु हस्तार्कं पञ्चमीतिथौ ।
भौमाश्विनौ च सप्तम्यां षष्ठ्यां चन्द्रैन्दवं तथा ॥ २० ॥