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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

by विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र)

Source: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (origin)

Public domain in India · Report a copyright issue

DevanagariHindipublished173 pages

Page 87 of 173

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६० मुद्राराक्षस

और भी वह दुष्ट ब्राह्मण चाणक्य —
दौवारिक ।—जय जय ।
राक्षस । - किसी भांति मिलाया या पकड़ा जा सकता है ?
दौवारिक । - अमात्य—
५ राक्षस ।—( बाए नेत्र के फड़कने का अपशकुन देख कर आप ही आप ) 'ब्राह्मण चाणक्य जय जय' और 'पकड़ा जा सकता है ? अमात्य' यह उलटी बात हुई और उसी समय असगुन भी हुआ । तौ भी क्या हुआ, उद्यम नही छोड़ेंगे ( प्रकाश ) भद्र ! क्या कहता है ?
१० दौवारिक ।—अमात्य ! पटने से करभक आया है सो आप से मिला चाहता है ।
राक्षस ।—अभी लाओ ।
दौवारिक ।—जो आज्ञा ( करभक के पास जाकर, उसको संग ले आकर ) भद्र ! मन्त्री जी वह बैठे हे, उधर जाओ
१५ ( जाता है ) ।
करभक ।—( मन्त्री को देख कर ) जय हो, जय हो ।
राक्षस ।—अजी करभक ! आओ आओ, अच्छे हो ?—बैठो ।
करभक ।—जो आज्ञा ( पृथ्वी पर बैठ जाता है ) ।
राक्षस ।—( आप ही आप ) अरे ! मै ने इस को किस काम का भेद लेने को भेजा था यह भूला जाता है ( चिन्ता-
२० करता है ) ।
( बेत हाथ में लेकर एक पुरुष आता है )
पुरुष ।— हटे रहना—बचे रहना—अजी दूर रहो—दूर रहो, क्या नही देखते ?
२५ नृप द्विजादि जिन नरन को, मंगल रूप प्रकास ।
ते न नीच मुखह लखहि, कैसो पास निवास ॥*


* प्राचीनकाल में आचार्य, राजा आदि नीचो को नही दखते थे।