Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages
Page 94Permalink
<!-- Page 94 OCR pending -->
Page 95Permalink
<!-- Page 95 OCR pending -->
Page 96Permalink
<!-- Page 96 OCR pending -->
Page 97Permalink
<!-- Page 97 OCR pending -->
Page 98Permalink
<!-- Page 98 OCR pending -->
Page 99Permalink
<!-- Page 99 OCR pending -->
Page 100Permalink
<!-- Page 100 OCR pending -->
Page 101Permalink
<!-- Page 101 OCR pending -->
Page 102Permalink
<!-- Page 102 OCR pending -->
Page 103Permalink
<!-- Page 103 OCR pending -->
Page 104Permalink
<!-- Page 104 OCR pending -->
Page 105Permalink

२ मुद्राराक्षसम्

हिन्दी अनुवाद—(गौरी का प्रश्न) तुम्हारे सिर पर बैठी हुई यह कौन सौभाग्यशालिनी (स्त्री) है ? (शिव का उत्तर ) चन्द्र-कला । (गौरी) यह इसका नाम है क्या ? (शिव) इसका नाम ही है और यह (नाम) तुम्हारा परिचित होता हुआ भी भुला क्यो गया ? (गौरी) मैं स्त्री को पूछ रही हूँ चन्द्रमा को नही। (शिव) यदि चन्द्रमा (पुंस्त्ववर्ग के होने के नाते तुम्हारे लिये ) प्रामाणिक नही है तो (तुम्हारी सखी ) विजया बतावे ( कि यह इसका नाम है या नही ) । इस प्रकार गौरी से गङ्गा को छिपाने के इच्छुक शङ्कर का छल आप लोगो की रक्षा करे ॥१॥

टिप्पणी—मुद्राराक्षसम्— यह प्रस्तुत नाटक का नाम है । मुद्रा = मुहर । राक्षस = नन्द का प्रधान मन्त्री । इस नाटक मे मुहर छुदी हुई अंगूठी के द्वारा राक्षस को फँसाया गया है, इसलिए 'मुद्राराक्षस' इसका नाम पड़ा है । मुद्रया गृहीत राक्षस मुद्राराक्षस मध्यमपदलोपी स० । तम् अधिकृत्य कृत नाटकम् इति मुद्रा-राक्षस + अण्, 'अधिकृत्य कृते ग्रन्थे' इत्यनेन, तत्र सकारोत्तरअकारस्य 'यस्येति च' इत्यनेन लोप । अथ लुप्तस्य 'नाटकम्' इति पदस्य विशेषणत्वात् अत्र नपुंसक-त्वम् । धन्या— भाग्यशालिनी । धनं लब्धा इति धन + यत् + टाप् स्त्रियाम् । पौराणिक कथा है कि भगीरथ की तपस्या से सन्तुष्ट गङ्गाजी भूतल पर उतरने से पूर्व शङ्कर जी के मस्तक पर गिरी । शिव ने पत्नी के रूप मे गङ्गा को स्वीकार कर अपने मस्तक पर धारण कर लिया । तब गङ्गा आत्मरूप से शिव-मस्तक पर रहने हुए भी धारारूप मे भूतल पर बहते हुए समुद्र मे पहुँच गई । इधर शङ्कर जब गङ्गा को धारण किए हुए पार्वती के पास आए तब गौरी शङ्कर के मस्तक पर अजनबी स्त्री को देखकर पूछ बैठी—'यह कौन परम सौभाग्यवती स्त्री है, जो आपके सिर पर विराजमान है । मैं अर्धांगिनी होती हुई भी आपके वाम पार्श्व मे ही स्थान पा सकी हूँ, किन्तु इसका ऐसा अहोभाग्य है कि यह आपके सिर पर शोभा पा रही है ।' इस प्रकार यहाँ 'धन्या' शब्द ईर्ष्या को व्यक्त करता है । परिचितमपि ते— तुम्हारा जाना-समझा हुआ भी । परि√चि + क्त कर्मणि वर्तमाने = परिचितम् अतएव 'ते' इत्यत्र 'क्तस्य च वर्तमाने' इति सूत्रेण अनुक्ते कर्तरि षष्ठी । कस्य हेतो— अत्र 'सर्वनाम्नस्तृतीया च' इति सूत्रेण षष्ठी । नारीं पृच्छामि नेन्दुम्— अत्र 'अकथितं च' इति सूत्रेण द्विकर्मकप्रच्छ्धातुयोगे कर्मसंज्ञा—द्वितीया । अतएव 'त्वां = शिव नारीं पृच्छामि नेन्दुम्' इति वाक्यरचना कार्या । देव्या— अत्र 'ध्रुवमपायेऽपादानम्' इति सूत्रेण अपादानसंज्ञा—पञ्चमी । यहाँ 'अन्तर्धौ

Page 106Permalink
<!-- Page 106 OCR pending -->
Page 107Permalink

४

मुद्राराक्षसम्

कर्तृणा, दोष्णा—बाहूना, मुहु —वारवारम्, सङ्कोचेनैव—सङ्क्षेपेणैव, अभि-नयन् —अभिनयकार्यं कुर्वन्, दाहभीते —अभिज्वलनशङ्कया, लक्ष्येषु—दृष्टि-विषयेषु, ज्वलनकणमुचम्—अग्निस्फुलिङ्गमोचनशीलाम्, उग्राम्—घोराम्, दृष्टि—नेत्रं भाललोचनमित्यर्थं, न—नहि, वध्नत —निक्षिपत, त्रिपुरविजयिन —महादेवस्य, आधारानुरोधात्—आधारस्य आश्रयस्य रङ्गभूमे ब्रह्माण्डोदरस्य इत्यर्थ अनुरोधात्—अनुकम्पया अर्थात् ब्रह्माण्डोदरम् अपर्याप्तं पूर्णताण्डवस्य इति हेतो, दुर्नृत्य—दुःखेन कष्टेन नृत्यं नर्तनं विकलताण्डवम् इति यावत्, व —युष्मान्, पातु—रक्षतु ॥२॥

**हिन्दी अनुवाद—**उत्पन्न होने वाली धरती की धँसान को पैर के मंद संचालन से बचाते हुए (अर्थात् कहीं धरा धमक से धँस न जाय इस कारण धीरे-धीरे पैरों को रखते हुए), समस्त लोकों का अतिक्रमण करने वाली भुजाओं को बार-बार संकुचित करके ही अभिनय करते हुए (अर्थात् कहीं भुजाओं के आघात से सम्पूर्ण लोक नष्ट न हो जायें इस भय से दृश्य पदार्थों पर अग्नि-स्फुलिंगों को छोड़ने वाली भयानक दृष्टि को न डालते हुए शिव का आधार के अनुरोध से (अर्थात् पूर्ण तांडव के लिए पर्याप्त न होने वाले निखिल ब्रह्मांड रूपी रंगभूमि के कारण) कृच्छ्रतापूर्ण नृत्य आप सब की रक्षा करे ॥२॥

टिप्पणी— आविर्भवन्तीम्— उत्पन्न होने वाली। आविम्‌√भू+लट् 'वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा' इत्यनेन भविष्यदर्थे, लट् शत्रादेश स्त्रियाम् = आविर्भवन्ती, ताम्। यह 'अवनतिम्' का विशेषण है। अवनतिम्— नीचे जाने को, धँसान को। अव√नम् +क्तिन् भावे स्त्रियाम् = अवनति ताम्। स्वैरपातै — सतर्कतापूर्वक या शनै शनै रखने से। ईरणम् ईर √ईर् + घञ् भावे। स्व ईर एषु इति स्वैरा बहुव्रीहि स०, 'स्वादीरेरिणा' इति वार्तिकेन वृद्धि। तादृशा पाता कर्मधारय स०, तै । करणे तृतीया। 'मन्द-स्वच्छन्दयो स्वैर' इत्यमर । रक्षत — बचाते हुए, दूर करते हुए। √रक्ष् + लट्-शतृ कर्तरि = रक्षन्, तस्य। यह 'त्रिपुरविजयिन' का विधेयात्मक विशेषण है। सर्वलोकातिगानाम्— सभी लोकों को पार कर जाने वाली। सर्वे लोका सर्वलोका कर्मधारय स०। तान् अतिगच्छन्ति इति सर्वलोक-अति√गम् +ड कर्तरि। तेषाम्। यह 'दोष्णाम्' का विशेषण है। दोष्णाम्— भुजाओं

Page 108Permalink
<!-- Page 108 OCR pending -->
Page 109Permalink
<!-- Page 109 OCR pending -->
Page 110Permalink
<!-- Page 110 OCR pending -->
Page 111Permalink
<!-- Page 111 OCR pending -->
Page 112Permalink
<!-- Page 112 OCR pending -->
Page 113Permalink
<!-- Page 113 OCR pending -->