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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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२ मुद्राराक्षसम्

हिन्दी अनुवाद—(गौरी का प्रश्न) तुम्हारे सिर पर बैठी हुई यह कौन सौभाग्यशालिनी (स्त्री) है ? (शिव का उत्तर ) चन्द्र-कला । (गौरी) यह इसका नाम है क्या ? (शिव) इसका नाम ही है और यह (नाम) तुम्हारा परिचित होता हुआ भी भुला क्यो गया ? (गौरी) मैं स्त्री को पूछ रही हूँ चन्द्रमा को नही। (शिव) यदि चन्द्रमा (पुंस्त्ववर्ग के होने के नाते तुम्हारे लिये ) प्रामाणिक नही है तो (तुम्हारी सखी ) विजया बतावे ( कि यह इसका नाम है या नही ) । इस प्रकार गौरी से गङ्गा को छिपाने के इच्छुक शङ्कर का छल आप लोगो की रक्षा करे ॥१॥

टिप्पणी—मुद्राराक्षसम्— यह प्रस्तुत नाटक का नाम है । मुद्रा = मुहर । राक्षस = नन्द का प्रधान मन्त्री । इस नाटक मे मुहर छुदी हुई अंगूठी के द्वारा राक्षस को फँसाया गया है, इसलिए 'मुद्राराक्षस' इसका नाम पड़ा है । मुद्रया गृहीत राक्षस मुद्राराक्षस मध्यमपदलोपी स० । तम् अधिकृत्य कृत नाटकम् इति मुद्रा-राक्षस + अण्, 'अधिकृत्य कृते ग्रन्थे' इत्यनेन, तत्र सकारोत्तरअकारस्य 'यस्येति च' इत्यनेन लोप । अथ लुप्तस्य 'नाटकम्' इति पदस्य विशेषणत्वात् अत्र नपुंसक-त्वम् । धन्या— भाग्यशालिनी । धनं लब्धा इति धन + यत् + टाप् स्त्रियाम् । पौराणिक कथा है कि भगीरथ की तपस्या से सन्तुष्ट गङ्गाजी भूतल पर उतरने से पूर्व शङ्कर जी के मस्तक पर गिरी । शिव ने पत्नी के रूप मे गङ्गा को स्वीकार कर अपने मस्तक पर धारण कर लिया । तब गङ्गा आत्मरूप से शिव-मस्तक पर रहने हुए भी धारारूप मे भूतल पर बहते हुए समुद्र मे पहुँच गई । इधर शङ्कर जब गङ्गा को धारण किए हुए पार्वती के पास आए तब गौरी शङ्कर के मस्तक पर अजनबी स्त्री को देखकर पूछ बैठी—'यह कौन परम सौभाग्यवती स्त्री है, जो आपके सिर पर विराजमान है । मैं अर्धांगिनी होती हुई भी आपके वाम पार्श्व मे ही स्थान पा सकी हूँ, किन्तु इसका ऐसा अहोभाग्य है कि यह आपके सिर पर शोभा पा रही है ।' इस प्रकार यहाँ 'धन्या' शब्द ईर्ष्या को व्यक्त करता है । परिचितमपि ते— तुम्हारा जाना-समझा हुआ भी । परि√चि + क्त कर्मणि वर्तमाने = परिचितम् अतएव 'ते' इत्यत्र 'क्तस्य च वर्तमाने' इति सूत्रेण अनुक्ते कर्तरि षष्ठी । कस्य हेतो— अत्र 'सर्वनाम्नस्तृतीया च' इति सूत्रेण षष्ठी । नारीं पृच्छामि नेन्दुम्— अत्र 'अकथितं च' इति सूत्रेण द्विकर्मकप्रच्छ्धातुयोगे कर्मसंज्ञा—द्वितीया । अतएव 'त्वां = शिव नारीं पृच्छामि नेन्दुम्' इति वाक्यरचना कार्या । देव्या— अत्र 'ध्रुवमपायेऽपादानम्' इति सूत्रेण अपादानसंज्ञा—पञ्चमी । यहाँ 'अन्तर्धौ