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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

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DevanagariSanskritpublished488 pages

About this granth

Mudrarakshasa (मुद्राराक्षसम्), "Rakshasa's Signet Ring", is Vishakhadatta's seven-act political drama, unusual in Sanskrit theatre for having statecraft rather than romance at its centre. After the fall of the Nandas, Chanakya sets out to win over Rakshasa, the loyal Nanda minister, as minister to Chandragupta Maurya. The plot turns on the capture of Rakshasa's seal, a staged quarrel between Chanakya and Chandragupta, a forged letter, and the breach between Rakshasa and his ally Malayaketu.

This edition carries a simple Sanskrit commentary, Hindi translation and notes by Tarinish Jha, Vyakarana-Vedantacharya, with a full introduction by Dr. Surendradev Shastri, head of Sanskrit at Town Degree College, Ballia. It was published by Ramnarayanlal Beniprasad, Allahabad; this copy is the third edition of 1983.

The introduction explains the kinds of poetry, the definition of a nataka, types of plot, and the origin and growth of Sanskrit drama, which makes the book well suited to students. It runs to about 488 pages.

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२ मुद्राराक्षसम्

हिन्दी अनुवाद—(गौरी का प्रश्न) तुम्हारे सिर पर बैठी हुई यह कौन सौभाग्यशालिनी (स्त्री) है ? (शिव का उत्तर ) चन्द्र-कला । (गौरी) यह इसका नाम है क्या ? (शिव) इसका नाम ही है और यह (नाम) तुम्हारा परिचित होता हुआ भी भुला क्यो गया ? (गौरी) मैं स्त्री को पूछ रही हूँ चन्द्रमा को नही। (शिव) यदि चन्द्रमा (पुंस्त्ववर्ग के होने के नाते तुम्हारे लिये ) प्रामाणिक नही है तो (तुम्हारी सखी ) विजया बतावे ( कि यह इसका नाम है या नही ) । इस प्रकार गौरी से गङ्गा को छिपाने के इच्छुक शङ्कर का छल आप लोगो की रक्षा करे ॥१॥

टिप्पणी—मुद्राराक्षसम्— यह प्रस्तुत नाटक का नाम है । मुद्रा = मुहर । राक्षस = नन्द का प्रधान मन्त्री । इस नाटक मे मुहर छुदी हुई अंगूठी के द्वारा राक्षस को फँसाया गया है, इसलिए 'मुद्राराक्षस' इसका नाम पड़ा है । मुद्रया गृहीत राक्षस मुद्राराक्षस मध्यमपदलोपी स० । तम् अधिकृत्य कृत नाटकम् इति मुद्रा-राक्षस + अण्, 'अधिकृत्य कृते ग्रन्थे' इत्यनेन, तत्र सकारोत्तरअकारस्य 'यस्येति च' इत्यनेन लोप । अथ लुप्तस्य 'नाटकम्' इति पदस्य विशेषणत्वात् अत्र नपुंसक-त्वम् । धन्या— भाग्यशालिनी । धनं लब्धा इति धन + यत् + टाप् स्त्रियाम् । पौराणिक कथा है कि भगीरथ की तपस्या से सन्तुष्ट गङ्गाजी भूतल पर उतरने से पूर्व शङ्कर जी के मस्तक पर गिरी । शिव ने पत्नी के रूप मे गङ्गा को स्वीकार कर अपने मस्तक पर धारण कर लिया । तब गङ्गा आत्मरूप से शिव-मस्तक पर रहने हुए भी धारारूप मे भूतल पर बहते हुए समुद्र मे पहुँच गई । इधर शङ्कर जब गङ्गा को धारण किए हुए पार्वती के पास आए तब गौरी शङ्कर के मस्तक पर अजनबी स्त्री को देखकर पूछ बैठी—'यह कौन परम सौभाग्यवती स्त्री है, जो आपके सिर पर विराजमान है । मैं अर्धांगिनी होती हुई भी आपके वाम पार्श्व मे ही स्थान पा सकी हूँ, किन्तु इसका ऐसा अहोभाग्य है कि यह आपके सिर पर शोभा पा रही है ।' इस प्रकार यहाँ 'धन्या' शब्द ईर्ष्या को व्यक्त करता है । परिचितमपि ते— तुम्हारा जाना-समझा हुआ भी । परि√चि + क्त कर्मणि वर्तमाने = परिचितम् अतएव 'ते' इत्यत्र 'क्तस्य च वर्तमाने' इति सूत्रेण अनुक्ते कर्तरि षष्ठी । कस्य हेतो— अत्र 'सर्वनाम्नस्तृतीया च' इति सूत्रेण षष्ठी । नारीं पृच्छामि नेन्दुम्— अत्र 'अकथितं च' इति सूत्रेण द्विकर्मकप्रच्छ्धातुयोगे कर्मसंज्ञा—द्वितीया । अतएव 'त्वां = शिव नारीं पृच्छामि नेन्दुम्' इति वाक्यरचना कार्या । देव्या— अत्र 'ध्रुवमपायेऽपादानम्' इति सूत्रेण अपादानसंज्ञा—पञ्चमी । यहाँ 'अन्तर्धौ

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४

मुद्राराक्षसम्

कर्तृणा, दोष्णा—बाहूना, मुहु —वारवारम्, सङ्कोचेनैव—सङ्क्षेपेणैव, अभि-नयन् —अभिनयकार्यं कुर्वन्, दाहभीते —अभिज्वलनशङ्कया, लक्ष्येषु—दृष्टि-विषयेषु, ज्वलनकणमुचम्—अग्निस्फुलिङ्गमोचनशीलाम्, उग्राम्—घोराम्, दृष्टि—नेत्रं भाललोचनमित्यर्थं, न—नहि, वध्नत —निक्षिपत, त्रिपुरविजयिन —महादेवस्य, आधारानुरोधात्—आधारस्य आश्रयस्य रङ्गभूमे ब्रह्माण्डोदरस्य इत्यर्थ अनुरोधात्—अनुकम्पया अर्थात् ब्रह्माण्डोदरम् अपर्याप्तं पूर्णताण्डवस्य इति हेतो, दुर्नृत्य—दुःखेन कष्टेन नृत्यं नर्तनं विकलताण्डवम् इति यावत्, व —युष्मान्, पातु—रक्षतु ॥२॥

**हिन्दी अनुवाद—**उत्पन्न होने वाली धरती की धँसान को पैर के मंद संचालन से बचाते हुए (अर्थात् कहीं धरा धमक से धँस न जाय इस कारण धीरे-धीरे पैरों को रखते हुए), समस्त लोकों का अतिक्रमण करने वाली भुजाओं को बार-बार संकुचित करके ही अभिनय करते हुए (अर्थात् कहीं भुजाओं के आघात से सम्पूर्ण लोक नष्ट न हो जायें इस भय से दृश्य पदार्थों पर अग्नि-स्फुलिंगों को छोड़ने वाली भयानक दृष्टि को न डालते हुए शिव का आधार के अनुरोध से (अर्थात् पूर्ण तांडव के लिए पर्याप्त न होने वाले निखिल ब्रह्मांड रूपी रंगभूमि के कारण) कृच्छ्रतापूर्ण नृत्य आप सब की रक्षा करे ॥२॥

टिप्पणी— आविर्भवन्तीम्— उत्पन्न होने वाली। आविम्‌√भू+लट् 'वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा' इत्यनेन भविष्यदर्थे, लट् शत्रादेश स्त्रियाम् = आविर्भवन्ती, ताम्। यह 'अवनतिम्' का विशेषण है। अवनतिम्— नीचे जाने को, धँसान को। अव√नम् +क्तिन् भावे स्त्रियाम् = अवनति ताम्। स्वैरपातै — सतर्कतापूर्वक या शनै शनै रखने से। ईरणम् ईर √ईर् + घञ् भावे। स्व ईर एषु इति स्वैरा बहुव्रीहि स०, 'स्वादीरेरिणा' इति वार्तिकेन वृद्धि। तादृशा पाता कर्मधारय स०, तै । करणे तृतीया। 'मन्द-स्वच्छन्दयो स्वैर' इत्यमर । रक्षत — बचाते हुए, दूर करते हुए। √रक्ष् + लट्-शतृ कर्तरि = रक्षन्, तस्य। यह 'त्रिपुरविजयिन' का विधेयात्मक विशेषण है। सर्वलोकातिगानाम्— सभी लोकों को पार कर जाने वाली। सर्वे लोका सर्वलोका कर्मधारय स०। तान् अतिगच्छन्ति इति सर्वलोक-अति√गम् +ड कर्तरि। तेषाम्। यह 'दोष्णाम्' का विशेषण है। दोष्णाम्— भुजाओं

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१४

मुद्राराक्षसम्

[ प्रवेश कर ]

**हिन्दी अनुवाद—नटी—**आर्य ! यह मैं हूँ । आप मुझे आज्ञा देकर अनुगृहीत करें ।

**सूत्रधार—**आर्ये ! आज्ञा अभी रहने दो। यह तो बताओ कि क्या आज तुमने पूज्य ब्राह्मणों को निमन्त्रण देकर परिजनों को कृतार्थ किया है, अथवा माननीय अतिथिगण घर पर पधारे हैं, जिससे यह विशिष्ट भोजन का आयोजन हो रहा है ।

**नटी—**आर्य ! मैंने महिमाशाली ब्राह्मणों को निमंत्रित किया है ।

**सूत्रधार—**कहो, किसलिए ।

**नटी—**भगवान् चन्द्रमा का ग्रहण लग रहा है ।

**सूत्रधार—**आर्ये ! किसने ऐसा कहा है ।

**नटी—**नगर के लोग ऐसा कह रहे हैं ।

**टिप्पणी—आर्ये—**पूज्य ! आराद् याता इति आर्या अर्थात् 'आराद् दूरसमीपयोः' इत्यनेन आराद् = असभ्यतादुराचारादिदोषेभ्यो दूरं गताश्च शिक्षासभ्यताविद्यादिभि देवास्पदत्वं प्राप्ता इति आर्याः । पृषोदरादित्वात् साधुत्वम् । अथवा अर्त्तुं योग्या आर्या √ऋ ( गतौ ) + ण्यत् 'ऋहलोर्ण्यत्' इत्यनेन । वसिष्ठ के मत से आर्य का लक्षण यह है—'कर्त्तव्यमाचरन् काममकर्त्तव्यमनाचरन् । तिष्ठति प्रकृताचारे स वा आर्य इति स्मृत ।।' नटी और सूत्रधार परस्पर 'आर्य' और 'आर्या' कहकर एक दूसरे को सम्बोधित करते हैं—'वाच्यौ नटीसूत्रधारावाद्य नाम्ना परस्परम्' । आज्ञानियोग—आदेश द्वारा कार्य मे लगाना। नि√युज् + णिच् + घञ् भावे = नियोग । आज्ञया नियोग आज्ञानियोग-तृतीयातत्० । **तत्रभवताम्—**पूज्य । भवत् शब्द के साथ 'तत्र' और 'अत्र' जोड देने से आदर सूचित होता है । किन्तु उपस्थित व्यक्ति के लिए 'अत्र' और अनुपस्थित के लिए 'तत्र' जोडना चाहिये । तेषां भवताम् इति तत्रभवताम् । यहाँ 'तेषाम्' 'तत्र' के रूप मे परिणत हो जाता है । तद् + तल् 'इतराम्योऽपि दृश्यन्ते' इत्यनेन । अतएव 'तत्र और 'भवताम्' अलग-अलग मानना चाहिए । यदि एक ही शब्द मानना हो तो इस प्रकार समास करना चाहिए—'ते भवन्त तत्रभवन्त'

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प्रथमोऽङ्कः १५

सुप्सुपा वा कर्मधारय स०, तेषाम् । यह 'ब्राह्मणानाम्' का विशेषण है । कुटुम्बकम्—पोष्यवर्ग । कुटुम्बानां समूहः इति कुटुम्ब + कन् । अतिथयः—अभ्यागत, मेहमान । अतति गच्छति न तिष्ठति इति √अत् + इथिन्, अथवा न विद्यते द्वितीया तिथिः यस्य स अतिथिः नञ्बहुव्रीहि स० । मनु ने कहा है—'एकरात्रं तु निवसन्मतिथिर्ब्राह्मणः स्मृतः ; अनित्यं हि स्थितो यस्मात् तस्मादतिथिरुच्यते ॥' पाकविशेषारम्भः—उत्तम भोजन की तैयारी । वि√शिष् + घञ् भावे = विशेषः । पाकस्य विशेषः । तस्य आरम्भः षष्ठीतत्० । कस्मिन् निमित्ते—अत्र 'निमित्तपर्यायप्रयोगे सर्वासां प्रायदर्शनम्' इति वार्तिकेन सप्तमी । उपरज्यते—ग्रहणयुक्त या राहुग्रस्त हो रहे हैं । उप√रञ्ज् + लट् ते कर्मणि । उपराग = ग्रहण । आह√ब्रू + लट्—तिप्, तिपः णल्, ब्रुवः आहादेशः । कभी-कभी 'आह' भूतकाल में 'उवाच' की जगह प्रयुक्त होता है । वहाँ इसे एक अव्यय समझना चाहिए ।

सूत्रधारः—आर्ये ! कृतश्रमोऽस्मि चतुः षष्ट्यङ्गे ज्योतिःशास्त्रे । तत् प्रवर्त्त्यतां भगवतो ब्राह्मणानुद्दिश्य पाकः । चन्द्रोपरागं प्रति तु केनापि विप्रलब्धासि । पश्य—

क्रूरग्रहः स केतुश्चन्द्रमसम्पूर्णमण्डलमिदानीम् ।
अभिभवितुमिच्छति बलात्— [ इत्यर्द्धोक्ते ]

[ नेपथ्ये ]

आः, क एष मयि स्थिते—

सूत्रधारः—

रक्षत्येनं तु बुधयोगः ॥ ६ ॥

व्याख्या—आर्ये—माननीये, चतुःषष्ट्यङ्गे—चतुःषष्टिसंख्यकशाखायुक्ते, ज्योतिःशास्त्रे—ग्रहादिस्थितिबोधके शास्त्रे, कृतश्रमः—कृताभ्यासः, अस्मि । तत्—तस्मात्, ( कथयामि यत् ) भगवतो ब्राह्मणान्, उद्दिश्य—निमित्तीकृत्य, पाकः—भोजन-निर्माणं, प्रवर्त्त्यतां—क्रियताम्, तु—किन्तु, चन्द्रोपरागं प्रति—चन्द्रग्रहणसम्बन्धे ( त्वं ) केनापि—केनचित् जनेन, विप्रलब्धासि—प्रतारितासि ( अर्थात् अद्य चन्द्रग्रहणं न भविष्यति ) ।

अन्वयः—स क्रूरग्रहः केतुः इदानीम् असम्पूर्णमण्डलम् चन्द्रम् बलात् अभिभवितुम् इच्छति ।

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