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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 466 of 488

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सप्तमोऽङ्कः ३६३

चण्डालौ—अज्ज ! चन्दणदास ! णिखादे शूले, ता दाणीं सज्जो होहि । ( आर्य ! चन्दनदास ! निखातः शूलः, तदिदानीं सज्जो भव । )

कुटुम्बिनी—अज्जा ! पलित्ताअध पलित्ताअध । ( आर्याः ! परित्रायध्वं परित्रायध्वम् । )

चन्दनदासः—भद्दमुह ! मुहुअत्तं चिट्ठ । अइ जीविदबच्छले ! किं एत्थ आकंदसि ? सग्गं गदा क्खु ते देवा णन्दा, जे दुक्खिदं इत्थीजनं प्पइदिणं अणुकम्पन्ति । ( भद्रमुख ! मुहूर्तं तिष्ठ । अयि जीवितवत्सले ! किमत्राक्रन्दसि ? स्वर्गं गताः खलु ते देवाः नन्दाः, ये दुःखितं स्त्रीजनं प्रतिदिनमनुकम्पन्ते । )

**हिन्दी अनुवाद—चन्दनदास—**तो तुमने क्या निश्चय किया है ?

कुटुम्बिनी— [ आँसू के साथ ] स्वामी के चरण का अनुसरण करती हुई ( नारी ) का अपने पर अनुग्रह होता है ।

**चन्दनदास—**यह तुम्हारा अयुक्त निश्चय है । इसलिए अभी लोकव्यवहार से अनभिज्ञ इस बालक पर तुम्हें दया करनी चाहिए ।

**कुटुम्बिनी—**प्रसन्न कुलदेवता इस पर अनुग्रह करें । बालक पुत्र ! अन्तिम दर्शन देने वाले पिता के चरणो को प्रणाम करो ।

पुत्र— [ चरणों पर गिरकर ] पिताजी ! आपसे रहित हुए मुझे क्या करना चाहिए ?

**चन्दनदास—**पुत्र ! चाणक्य से रहित देश में वास करना चाहिए ।

**दोनों चाण्डाल—**आर्य चन्दनदास ! सूली गड़ चुकी, इसलिए अब तैयार हो जाइए ।

**कुटुम्बिनी—**आर्यो ! बचाओ, बचाओ ।

**चन्दनदास—**भद्रमुख ! क्षण भर रुक जाओ । अरी प्राणप्यारी ! क्यो इस ( हर्ष के ) विषय में रो रही हो ? वे महाराज नन्द तो स्वर्ग चले गए, जो दुःख में पड़ी स्त्रियों पर सदा दया करते थे ।

**टिप्पणी—व्यवसितम्—**स्थिरीकृतम् । **आत्मानुग्रहः—**आत्मनः अनु-