मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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Read in contextसप्तमोऽङ्कः ३६१
**चन्दनदासः—**अज्जे ! कुटुम्बिणि ! णिवत्तस्स तुमं सपुत्ता । वज्झट्ठाणं क्खु एदं, अदो अवरं अभूमि क्खु अणुगच्छिदुम् । ( आर्ये ! कुटुम्बिनि ! निवर्तस्व त्वं सपुत्रा । वध्यस्थानं खल्वेतत्, अतोऽपरमभूमिः खल्वनुगन्तुम् ।)
कुटुम्बिनी—[ सवाष्पम् ] परलोअं प्पंथियदो अज्जो, ण उण देसन्तरं ता अज्जोग्गो दाणीं कुलजणस्स णिवत्तिदुं । ( परलोकं प्रस्थित आर्यो न पुनर्देशान्तरं, तदयो ग्यमिदानीं कुलजनस्य निवर्तितुम् । )
**चन्दनदासः—**अज्जे ! सच्चं, मित्तकज्जेण मम विणासो, न पुरिसदोसेण । ता किं हरिसट्ठाणे वि रोइसि त्ति ? (आर्ये ! सत्यं, मित्रकार्येण मम विनाशो, न पुरुषदोषेण; तत् किं हर्षस्थानेऽपि रोदिषि इति ? )
**कुटुम्बिनी—**अज्ज ! जइ एव्वं, ता अणुचिदं दाणीं कुलजणेण णिवत्तिदुं। ( आर्य ! यद्येवं, तदनुचितमिदानीं कुलजनेन निवर्तितुम् । )
हिन्दी अनुवाद—[ चारों ओर देखकर ] हे प्रियमित्र जिष्णुदास ! क्यों मुझे उत्तर भी नहीं देते हो ? अथवा ये लोग दुर्लभ हैं, जो इस समय आँखों के सामने भी उपस्थित हैं। [ आँसुओं के साथ ] आँसुओं के गिराने मात्र से प्रतीकार किए हुए, लौटते हुए और उमड़ते हुए शोक से मलिन मुख वाले ये हमारे प्रिय मित्र आँसू भरी आँखों से मेरा अनुसरण कर रहे हैं। [ ( यह कहकर ) घूमता है । ]
दोनों चाण्डाल—[ घूमकर और देखकर ] आर्य चन्दनदास ! वध्यस्थान पर आप पहुँच गये हैं । इसलिए परिवार को विदा कर दीजिए ।
**चन्दनदास—**आर्य गृहिणी ! पुत्र सहित तुम लौट जाओ । यह वध्यस्थान है । इसके आगे अनुसरण करना ठीक नहीं है ।
कुटुम्बिनी—[ आँसू के साथ ] आर्य परलोक की यात्रा कर रहे हैं, दूसरे देश की नहीं । इसलिए इस समय बन्धुवर्ग का लौट जाना उचित नहीं है ।
**चन्दनदास—**आर्ये ! सत्य है, मित्र के कार्य से मेरा विनाश हो रहा है, पुरुष के दोष ( चोरी आदि ) से नहीं; इसलिए क्यों हर्ष के स्थान पर भी रो रही हो ?