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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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Page 457

३८४ | मुद्राराक्षसम्

मुद्राङ्कन आदि ) कार्य क्यो सोचता ? इस प्रकार मेरी बुद्धि तर्क वितर्क में संलग्न होती हुई निश्चय नहीं कर पा रही है ॥ २० ॥

टिप्पणी—यदि स इस श्लोक में चाणक्य की नीति की दुर्बोधता दिखाई गई है। यदि शकटदास का जान-बूझकर राक्षस के पास पहुँचाया गया तो वधिकों को मरवाने की क्या आवश्यकता थी ? और यदि शकटदास यथार्थ रूप में भागकर गया था तो उसने कूटपत्र लिखकर स्वामी का द्रोह जैसा कुत्सित कर्म क्यो किया ? यहाँ पाठक यह न समझ बैठे कि वाधकों को मरवाने की बात सही ही होगी। कारण वह पुरुष चाणक्य का गुप्तचर है। वह राक्षस को भुलावा देने के लिए ऐसी बात गढ़ सकता है। इस प्रसंग में एक बात और ध्यान देने योग्य है कि मलयकेतु के यहाँ राक्षस के साथ जो घटना घटित हुई, उसके उपरान्त राक्षस ने अपने परम विश्वासपात्र शकटदास से उस कूटपत्र के सम्बन्ध में क्यों नहीं पूछा ? इस पद्य में वाक्यार्थहेतुक काव्यलिङ्ग अलंकार है। इसमें शिखरिणी छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, १३ में देखिए ॥ २० ॥

[ विचिन्त्य ] तस्मात्—

नायं निस्त्रिंशकालः प्रथममिह कृते घातकानां विघाते
नीतिः कालान्तरेण प्रकटयति फलं किं तया कार्यमत्र ? ।
औदासीन्यं न युक्तं प्रियसूहृदि गते मत्कृते चातिघोरां
व्यापात्तिं ज्ञातमस्य स्वतनूमहमिमां निष्क्रयं कल्पयामि ॥ २१ ॥

[ इति निष्क्रान्ताः सर्वे । ]

॥ इति षष्ठोऽङ्कः ॥

अन्वय — इह प्रथमं घातकानां विघाते कृते अयं निस्त्रिंशकालः न। नीतिः कालान्तरेण फलं प्रकटयति, अत्र तया किं कार्यम् ? प्रियसूहृदि मत्कृते अति घोरं व्यापत्तिं गते औदासीन्यं च न युक्तम्। ज्ञातम्—अहम् इमां स्वतनूम् अस्य निष्क्रयं कल्पयामि ॥ २१ ॥

व्याख्या — इह—अस्मिन् चन्दनदासमोचनकर्मणि, प्रथम-पूर्वं चन्दनदासस्य मोचनात् पूर्वमित्यर्थः, घातकानां—घातकैरित्यर्थः, ( चन्दनदासस्य ) विघाते—विनाशे, कृते—विहिते ( सति ), अयम्—एषः, निस्त्रिंशकालः—खड्ग-