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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 450 of 488

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Page 450

षष्ठोऽङ्कः ३७७

पुरुषः—अज्ज ! ण दाव बावादीअदि । सो क्खु संपदं पुणो पुणो अमच्चरक्खसस्स घरजणं जाचीअदि । ण सो मित्तवच्छलदाए जाची-अन्तो वि तं समप्पेदि । ता एदिणा कालणेण होदि से मरणस्स काल-हरणं । (आर्य ! न तावत् व्यापाद्यते । स खलु साम्प्रतं पुनः पुनरमात्य-राक्षसस्य गृहजनं याच्यते । न स मित्रवत्सलतया याच्यमानोऽपि तं समर्पयति । तदेतेन कारणेन भवत्यस्य मरणस्य कालहरणम् ।)

राक्षसः—[ सहर्षमात्मगतम् ] साधु वयस्य चन्दनदास ! साधु साधु !—

शिवेरिव समुद्भूतं शरणागतरक्षया ।
निचीयते त्वया साधो ! यशोऽपि सुहृदा विना ॥१८॥

अन्वयः—साधो शरणागतरक्षया समुद्भूत शिवेः यश इव त्वया सुहृदा विनाऽपि निचीयते ॥१८॥

व्याख्या—साधो !—सज्जन ! शरणागतरक्षया—शरण रक्षितारम् आग-तस्य प्राप्तस्य ( जनस्य ) रक्षया त्राणेन, समुद्भूतम्—उत्पन्नं, शिवेः—उशीनरदेशाधिपस्य, यश इव—कीर्तिरिव, ( यशः ) त्वया—भवता, सुहृदा—मित्रेण, विनाऽपि—ऋतेऽपि, निचीयते—अर्जयते ॥१८॥

हिन्दी अनुवाद—राक्षस—चन्दनदास को मार तो नहीं दिया ?

पुरुष—मारे नहीं गए हैं । इस समय उनसे बार-बार अमात्य राक्षस का परिवार माँगा जा रहा है । ( किन्तु ) वे मित्र-प्रेम के कारण माँगे जाते हुए भी उस ( अमात्य परिवार ) को नहीं सौंप रहे हैं । सो इस कारण से उनकी मृत्यु का कालक्षेप हो रहा है ।

राक्षस—[ हर्षपूर्वक मन में ] धन्य मित्र चन्दनदास ! धन्य ( हो ) धन्य !—

महात्मन् ! शरण में आये हुए की रक्षा करने से उत्पन्न शिवि के यश के समान ( यश ) तुमने बिना मित्र के भी अर्जित कर लिया ॥१८॥

टिप्पणी—सः गृहजनं याच्यते—यहाँ 'सः' 'याच्यते' का अप्रधान कर्म