मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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Read in context३७६ मुद्राराक्षसम्
न आकर्णयामि, तावदेव—तत्कालपर्यन्तमेव, आत्मान—प्राणान्, व्यापदयामि—विनाशयामि' इति—अतो हेतोः ज्वलन—अग्नौ, प्रवेष्टुकाम—प्रवेषाभिलाषी, श्रेष्ठी, जिष्णुदास , नगरात्—पुरात्, निर्गत —निःसृतः । अहमपि, यावत् प्रियवयस्यस्य, जिष्णुदासस्य, अश्रोतव्य, न शृणोमि, तावत्, उद्वध्य—ऊर्ध्वबन्धन कृत्वा, आत्मान, व्यापदयामि, इति—अतो हेतो, इदम्—एतत्, जीर्णोद्यान—पुरातनोपवनम्, आगतोऽस्मि—प्राप्तोऽस्मि ।
हिन्दी अनुवाद—[ प्रष्ट ] भद्र ! तब उस प्रकार कहे जाने पर चन्द्रगुप्त ने क्या उत्तर दिया ?
पुरुष—आर्य ! तब इस प्रकार कहे जाने पर चन्द्रगुप्त ने सेठ जिष्णुदास को उत्तर दिया—'जिष्णुदाम ! मैंने धन के निमित्त सेठ चन्दनदाम को नहीं बांधा है। किन्तु इसने अमात्य राक्षस के परिवार को छिपा रक्खा है और बहुत कहे-सुने जान पर भी समर्पित नहीं किया । अत, यदि अमात्य राक्षस के परिवार को सौंप देता है तो इसका छुटकारा है, अन्यथा इसका प्राणनाशक दण्ड है' ऐसा कहकर चन्दनदाम को वध्यभूमि में लाया गया है। उसके वाद 'जब तक प्रिय मित्र चन्दनदास के न सुनने योग्य ( समाचार ) को नहीं सुनता हूँ तब तक आत्महत्या कर लेता हूँ'—यह सोचकर अग्नि म प्रवेश करने की इच्छा से सेठ जिष्णुदाम नगर से बाहर निकल गया है। मैं भी जब तक प्रिय मित्र जिष्णुदास का न सुनने योग्य ( ममाचार ) नहीं सुनता हूँ तब तक फासी लगाकर आत्महत्या कर लेता हूँ—इस विचार से जीर्ण उपवन में आया हूँ।
टिप्पणी—अभिहितेन—कथितेन । अभि√धा+क्त कर्मणि, 'दधातेर्हिः' इत्यनेन धा इत्यस्य हि आदेश । प्रतिपन्नम्—प्रत्युक्तम । भणितेन—कथितेन ।√भण्+क्त कर्मणि । अर्थस्य कारणेन—अत्र शेषत्वविवक्षया षष्ठी, अन्यथा 'अर्थेन कारणेन' इति प्रयोगेण भाव्यम् । अथवा √वृ+णिच्+ल्युट् भावे=कारणम् । अर्थस्य यत् कारण=प्रेरणा तेन हेतुना इत्यर्थोऽवसेयः । प्राणहर —प्राणान् हरतीति प्राण√हृ+अच् कतरि अथवा हरतीति हरः प्राणाना हर प्राणहरः ।
राक्षस —न खलु व्यापादितश्चन्दनदास ?