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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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षष्ठोऽङ्कः १७३

**पुरुष—**क्या उपाय है ? यह कहता हूँ, आर्य सुनें ।
**राक्षस—**भद्र ! सावधान हूँ ।
**पुरुष—**आर्य जानते होगे कि इस नगर में चन्दनदास नाम के सेठ जौहरी हैं ।
राक्षस—[ विषाद के साथ मन में ] यह तो भाग्य ने मेरे विनाश के उपदेश के आने का मार्ग खोल दिया है। हृदय ! स्थिर हो जाओ। तुम्हें कुछ कष्टदायक ( वचन ) सुनना है । [ प्रकट ] भद्र ! सुना जाता है कि वे सज्जन मित्र के प्रेमी है । उनका क्या हुआ ?
**पुरुष—**वे इन जिष्णुदास के प्रिय मित्र हैं ।
राक्षस—[ मन में ] यह हृदय का शोकरूपी वज्रपात समीप है । [ प्रकट ] तब क्या हुआ ?
**पुरुष—**तब आज जिष्णुदास ने प्रिय मित्र के स्नेह के अनुरूप चन्द्रगुप्त से निवेदन किया ।
**राक्षस—**कहो क्या ?
**पुरुष—**महाराज ! मेरे घर में कुटुम्ब के भरण-पोषण के लिये पर्याप्त धन है । उसे लेकर मेरे प्रिय मित्र चन्दनदास को छोड़ दिया जाय ।

टिप्पणी—सुहृत्स्नेहपक्षपातिना—मित्रानुरागासक्तेन । सुहृदः स्नेहः, तस्मिन् पक्षपातः, सः अस्ति अस्य इतिसुहृत्स्नेहपक्षपात + इनि । विस्तरेण—वि√स्तृ—अप् भावे = विस्तरः; विस्तार शब्दे तु 'प्रथमे वावशब्दे' इति सूत्रेण घञ् प्रत्ययः । अतएव 'वाक्यस्य विस्तरः, 'पटस्य विस्तारः' इत्यादि । तेन । करणे तृतीया । अस्मद्विनाशदीक्षाप्रकाशद्वारम्—अस्मद्विनाशेपदेशागमनमार्गः । अभ्यर्णः—समीपवर्ती । अभि√अर्द् + क्त कर्तरि = अभ्यर्णः वा अभ्यर्दितः ।

राक्षसः— [ स्वगतम् ] साधु जिष्णुदास ! साधु !! अहो ! दर्शितो मित्रस्नेहः । कुतः ?—

पितॄन् पुत्राः पुत्रान् परवदभिहिंसन्ति पितरो
यदर्थं सौहार्दं सुहृदि च विमुञ्चन्ति सुहृदः ।