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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 445 of 488

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Page 445

३७२ मुद्राराक्षसम्

पुरुष — अत्थि, जाणादि अज्जो, एत्थ णअरे मणिआरसेट्ठी चन्दन-
दासो णाम। ( अस्ति, जानात्यार्य , इह नगरे मणिकारश्रेष्ठी चन्दन-
दामो नाम । )

राक्षस — [सविषादात्मगतम्] एतत्तदपावृतमस्मद्विनाशदीक्षाप्रकाशद्वार
दैवेन। हृदय ! स्थिरीभव, किमपि ते कष्टतरमाकर्णनीयम्। [ प्रकाशम् ]
भद्र ! श्रूयते मित्रवत्सल म साधु । किं तस्य ?

पुरुषः— सो एदस्स जिष्णुदासस्स पिअवअस्सो होदि। ( स एतस्य
जिष्णुदासस्य प्रियवयस्यो भवति । )

राक्षस — [ स्वगतम् ] अयमभ्यर्णः शोकवज्रपातो हृदयस्य [ प्रकाशम् ]
ततस्तत ?

पुरुष— तदो जिष्णुदासेण पिअवअस्सस्स सिणेहसरिस अज्ज
विण्णत्तो चन्दउत्तो । ( ततो जिष्णुदासेन प्रियवयस्यस्य स्नेहमदृशमद्य
विज्ञप्तश्चन्द्रगुप्त । )

राक्षस — कथय किमिति ?

पुरुष — देव ! अत्थि मे गेहे कुटुम्बभरणपज्जत्तो अत्थो। तस्स
विणिमएण मुञ्चिज्जदु मे पिअवअस्सो चन्दनदासो त्ति । ( देव ! अस्ति
मे गृहे कुटुम्बभरणपर्याप्तोऽर्थ । तस्य विनिमयेन मुच्यता मे प्रियवयस्य-
श्चन्दनदास इति । )

हिन्दी अनुवाद—पुरुष— आर्य ! और क्या ?

राक्षस— [ आवेग के साथ मन ही मन ] चन्दनदास इसके मित्र के
प्रिय मित्र हैं, और उसके प्रिय मित्र का विनाश ही अग्नि मे प्रवेश करने का
कारण है। इसलिए सचमुच मित्र-स्नेह के पक्षपाती हृदय से मैं व्याकुल हूँ।
[ प्रकट ] भद्र ! तुम्हारे उस मित्र का भी सुचरित विस्तार से सुनना
चाहता हूँ।

पुरुष— आर्य ! इसके बाद मैं अभागा मृत्यु के विघ्न को उत्पन्न करने में
समर्थ नही हूँ।

राक्षस— भद्रमुख सुनने योग्य क्या को कहे।