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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 431 of 488

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Page 431

३५४ | मुद्राराक्षसम्

काव्यलिंग तथा श्लेषानुप्राणित उपमा अलंकारों की संसृष्टि है। इसमें शार्दूलविक्रीडित छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, १२ में देखिए ॥ ५ ॥

अपि च—

पतिं त्यक्त्वा देवं भुवनपतिमुच्चैरभिजनं
गता छिद्रेण श्रीवृषलमविनीतेव वृषली ।
स्थिरीभूता चास्मिन् किमिह करवाम स्थिरमपि
प्रयत्नं नो येषां विफलयति दैव द्विषदिव ॥ ६ ॥

अन्वयः—श्रीः उच्चैरभिजनं भुवनपतिं देवं त्यक्त्वा अविनीता वृषली इव छिद्रेण वृषलं गता अस्मिन् स्थिरीभूता च । इह किं करवाम येषां न स्थिरमपि प्रयत्नं द्विषदिव दैव विफलयति ॥६॥

व्याख्या—श्रीः—लक्ष्मी, उच्चैरभिजनम्—उच्चे उन्नत अभिजन वंशः यस्य तादृशं, भुवनपति—जगत्प्रभुं, पतिं—स्वामिनं, देवं—राजानं नन्दं, त्यक्त्वा—विहाय, अविनीता—विनयरहिता दुश्चरितेति यावत्, वृषली इव—शूद्रा इव, छिद्रेण—रन्ध्रेण भर्तुरनवधानतयेति यावत्, वृषलं—मौर्यं, गता—समाश्रिता, अस्मिन्—मौर्ये, स्थिरीभूता च—अचला विद्यते च । इह—अस्मिन् विषये, किं करवाम—किं विदधाम वयमिति शेषः, येषाम्, न—अस्माकं स्थिरमपि—दृढमपि, प्रयत्न—प्रयासः, द्विषदिव—शत्रुरिव, दैव—भाग्यं, विफलयति—विफलीकरोति ॥६॥

हिन्दी अनुवाद—और भी—

लक्ष्मी विशाल कुल में उत्पन्न सम्राट् पति महाराज (नन्द) को छोड़कर दुश्चरित्र शूद्रा के समान छल से मौर्य के पास चली गई और उस (मौर्य) में अचल (भी) हो गई । इस विषय में हम क्या करें, जिन हमारे सुदृढ प्रयत्न को भी शत्रु के समान भाग्य निष्फल कर देता है ॥६॥

टिप्पणी—उच्चैरभिजनम्—अभिजायते अस्मिन् इति अभिजन = वंशः अभि√जन्+क घञर्थे । उच्चैः अभिजने यस्य स, तम् । भुवनपतिम्—संसार के स्वामी । इन दोनों विशेषणों से यह सूचित किया गया है कि नन्द छोड़ने योग्य नहीं थे, फिर भी लक्ष्मी ने उन्हें छोड़कर दुश्चरित्रा नीच स्त्री के