Skip to content
SarvaKosh
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 427 of 488

Read in context
Page 427
३५०मुद्राराक्षसम्

में प्रयत्नशील अमात्य राक्षस निकलकर सम्प्रति असफल होते हुए फिर इसी कुसुमपुर में कैसे आ गए ?

सिद्धार्थक—मित्र ! मैं अनुमान करता हूँ कि चन्दनदास के स्नेह के कारण ।

सुसिद्धार्थक—मित्र ! सचमुच चन्दनदास के स्नेह के कारण ? क्या तुम चन्दनदास के छुटकारे की संभावना कर रहे हो ?

सिद्धार्थक—मित्र ! उस अभागे का छुटकारा कहाँ ? उसे तो इस समय आर्य चाणक्य की आज्ञा से हम दोनों के द्वारा वध्य स्थान में प्रवेश कराकर मार डालना है ।

सुसिद्धार्थक—[ क्रोध के साथ ] मित्र ! क्या आर्य चाणक्य को दूसरा कोई वधिक नहीं मिला, जिससे हम दोनों को ऐसे क्रूर कार्य में नियुक्त कर दिया ?

सिद्धार्थक—मित्र ! संसार में जीवन चाहने वाला कौन आर्य चाणक्य की आज्ञा अस्वीकार करता है ? इसलिए आओ चंडाल का वेश धारण करके चन्दनदास को वध्यस्थान में ले चलते हैं ।

[ दोनों बाहर चले जाते हैं । ]

प्रवेशक समाप्त

टिप्पणी—कृतव्यवसाय—विहितोद्योग । अकृतार्थ—असफल । तर्कयामि—सम्भावयामि । अथ—अत्र प्रश्नार्थकोऽयं शब्दः । 'मङ्गलानन्तरारम्भप्रश्नकात्स्न्र्येष्वथो अथ' इत्यमरः । अधन्यस्य—हतभाग्यस्य । आज्ञप्या—आज्ञया । आ√ज्ञप्+णिच्+क्तिन् भावे=आज्ञप्ति, तया । व्यापादयितव्य—हन्तव्यः । वि आ√पद्+णिच्+तव्य कर्मणि । जीवितुकाम—अत्र 'लुम्पेदवश्यम् कृञ्ये' इति कारिकया मलोपः । प्रतिकूलयति—अन्यथाकरोति अस्वीकरोति वा । प्रतिकूलेन योजयति इति प्रतिकूल+णिच्+लट्—तिप् । प्रवेशक—दे० ५वें अंक में श्लोक ३ से पूर्व टिप्पणी ।

[ ततः प्रविशति रज्जुहस्तः पुरुषः । ]