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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 396 of 488

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Page 396

पञ्चमोऽङ्कः ३१७

मलयकेतुः—[ स्वगतम् ] विज्ञायते । [ प्रकाशम् ] यद्येवं, तत् किमयमार्थेण सलेखः पुरुषः कुसुमपुरं प्रस्थापितः ?

हिन्दी अनुवाद—[ समीप जाकर ] कुमार की विजय हो, विजय हो ।

मलयकेतुः—आर्य ! प्रणाम करता हूँ । इस आसन पर बैठिए ।

राक्षस—[ बैठता है ]

मलयकेतु—अमात्य ! बहुत देर के बाद आर्य के दर्शन होने से हम बेचैन हैं ।

राक्षस—कुमार ! प्रयाण की तैयारी करते हुए मैंने कुमार से यह उलाहना पाया ।

मलयकेतु—अमात्य ! प्रयाण की कैसे तैयारी की है, यह सुनना चाहता हूँ ।

राक्षस—कुमार ! कुमार के अनुयायी राजाओ को इस प्रकार आदेश दिया है ।

[ ‘प्रस्थातव्यम्’ इत्यादि श्लोक को पुनः पढ़ता है । ]

मलयकेतु— [ मन में ] समझता हूँ, कैसे जो ही मेरे विनाश के द्वारा चन्द्रगुप्त की सेवा करने के लिए उद्यत हैं, वे ही मुझे घेर रहे हैं । [ प्रकट ] आर्य ! (ऐसा) कोई है, जो पाटलिपुत्र जा रहा है या वहाँ से आ रहा है ?

राक्षस—कुमार ! अब जाने-आने का प्रयोजन समाप्त हो गया है । पाँच-छः दिनो में हम ही वहाँ पहुँच जाएँगे ।

मलयकेतु—[ मन में ] जानता हूँ । [ प्रकट ] यदि ऐसा है तो आर्य ने इस व्यक्ति को पत्र के साथ पाटलिपुत्र क्यों भेजा है ?

टिप्पणी—चिरदर्शनेन—बहुकालोत्तरमवलोकनेन । यहाँ गूढ अर्थ यह है कि आपका दर्शन इस समय मेरे लिए उद्वेगजनक हो रहा है । प्रतिविधानम्—प्रयत्न, व्यवस्था । अनुतिष्ठता—कुर्वता । अवसितम्—समाप्त । अव√सो+क्त कर्तरि । पञ्चषैः—पञ्च षट् वा परिमाण येषां तानि पञ्चषानि बहुव्रीहि स०, ‘बहुव्रीहौ संख्येये डजबहुगणात्’ इत्यनेन् डच्प्रत्ययः । तैः । यह ‘अहोभिः’ का विशेषण है ।