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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 385 of 488

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Page 385

३०४ मुद्राराक्षसम्

सिद्धार्थक — [भय नाटयन् ] तुम्हहिं । ( युष्माभि । )
भागुरायण.—किमस्माभि ?
सिद्धार्थक —मिस्सेहिं गहीदो, ण आणामि, किं भणामि त्ति । ( मिश्रेगृहीतो न जानामि किं भणामीति । )
भागुरायण —[ सक्रोधम् ] एष ज्ञास्यसि। भद्र भासुरक ! वहिर्नीत्वा ताड्यता तावत्, यावत् सवमनन कथित भवेत् ।
भासुरक —ज अज्जो आणवेदि । ( यदार्य आज्ञापयति । )
[ इति सिद्धार्थकेन सह निष्क्रान्त ]
[ पुन प्रविश्य ] अज्ज ! इअ तस्म ताडीअमाणस्स कक्खादो णाममुद्दालच्छिदा जाहरणपेटिआ णिवडिड्डा । ( आर्य ! इय तस्य ताड्यमानस्य कक्षत नाममुद्रालाञ्छिताऽऽभरणपेटिका निपतिता । )

हिन्दी अनुवाद—मलयकेतु — भागुरायण ! कैसा लेख है ?
भागुरायण—भद्र सिद्धार्थक ! यह किसका लेख है ?
सिद्धार्थक—आर्य ! नहीं जानता हूँ ।
भागुरायण—रे धूर्त ! पत्र ले जा रहा है और नहीं जानता है कि यह किसका है ! अच्छा, रहे सब कुछ । तुझसे मौखिक संदेश किसे सुनना है ?
सिद्धार्थक—[ भय का अभिनय करते हुए ] आप को ।
भागुरायण—क्या मुझको ?
सिद्धार्थक—आपके द्वारा पकड़ा हुआ मैं नहीं जानता हूँ कि क्या कह रहा हूँ ।
भागुरायण—[ क्रोध के साथ ] अभी जान जाओगे । भद्र भासुरक ! बाहर ले जाकर ( इसे ) तबतक पीटो, जबतक यह सब कुछ ( न ) बता दे ।
भासुरक—आर्य की जैसी आज्ञा ।
[ सिद्धार्थक के साथ चला जाता है । ]
[ पुनः प्रवेश करके ] आर्य ! पीटे जाते हुए इसकी काँख से यह नाम की छाप से चिह्नित गहनों की पेटी गिर पड़ी ।