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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 371 of 488

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Page 371

२८८ मुद्राराक्षसम्

सन्धास्यते किम्—सन्धिं करिष्यति किम्, वा—अथवा, भक्तिगुणस्य—भक्ति अनुराग एव गुण तस्य, स्थैर्यं—स्थिरता, विगणयन्—विचारयन्, सत्यसन्धः—सत्या यथार्था सन्धा प्रतिज्ञा यस्य तथाभूत, भवेत् किम्—स्यात् किम्, इति अनेन प्रकारेण, मे—मम, चेत—चित्तम्, आरूढकुलालचक्रम्—आरूढम् अधिष्ठितम् कुलालचक्रम् कुम्भकारचक्रम् येन तादृशम्, इव—तद्वत, चिर—बहुकाल, भ्राम्यति—सन्देहास्पद भवतीत्यर्थः ॥५॥

हिन्दी अनुवाद—[ तदनन्तर मलयकेतु और साथ-साथ प्रतीहारी का प्रवेश ]

मलयकेतु—[मन में] ओह ! राक्षस के प्रति संदेहों की बहुलता से व्याकुल मेरी बुद्धि निश्चय नहीं कर पा रही है । क्योकि—

कुशल, चाणक्य से परित्यक्त और नन्दवंश का अवलम्बन करने वाले चन्द्रगुप्त के साथ ( वह राक्षस ) नन्द-वश म अनुराग होने से दृढ भक्ति के कारण क्या संधि कर लेगा । अथवा मया (मेरी) भक्ति रूपी गुण की दृढता का विचार करत हुए सत्यप्रतिज्ञ होगा, इस प्रकार मेरा चित्त कुम्हार के चक्र पर चढ़े हुए के समान चिरकाल से घूम रहा है ॥५॥

टिप्पणी—विकल्पबाहुल्यात्—सन्देहाधिक्यात् । विशेषेण कल्प्यते इति विकल्प कर्मणि घञ् । तस्य बाहुल्यम् । तस्मात् । हेतो पञ्चमी । कृतिना—कुशलेन या कृतार्थ । इस श्लोक में उत्प्रेक्षा अलंकार से संसृष्ट परिकर अलंकार का विकल्प नामक अलंकार के साथ साङ्कर्य है । इसमे शार्दूलविक्रीडित छन्द है । इस छन्द का लक्षण २, १२ में देखिए ॥५॥

[ प्रकाशम् ] विजये ! क्व भागुरायण !

प्रतीहारी—कुमार ! एसा खु कडआदो णिक्कमिदुकामाण मुुद्दा-प्पदाणं अणु चिट्ठदि । ( कुमार ! एष खलु कटकान्निष्क्रमितुकामानां मुद्राम्प्रदानमधितिष्ठति । )

मलयकेतु—विजये ! मुहूर्त्तं निभृतपदसञ्चारा भव, यावदस्य पराङ्मुखस्यैव पाणिभ्यां नयने पिदधामि ।

प्रतीहारी—जं कुमारो आणवेदि । ( यत् कुमार आज्ञापयति ! )

भासुरक—[ प्रविश्य ] अज्ज ! एसो क्खु क्खवणओ मुुद्दाणिमित्त

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