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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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Page 351

२६८ मुद्राराक्षसम्

तटाः श्यामाः सिन्दूरशोणा शतशः गजपतय तुङ्गकूल प्रस्यन्दिसलिलं कल्लोल-
मुखर स्रोत खातावसीदत्तट श्यामोपकण्ठद्रुम शोणं पास्यन्ति ॥ १६ ॥

व्याख्या—मम—मे, उत्तुङ्गा—अत्युनताः, स्रुतमदसलिलाः—स्रुत क्षरित मदसलिल दानवारि येषां तादृशाः, अलिमुखराः—अलिभिः भ्रमरै मुखराः शब्दायमानाः, उरुदशने—उरुभि बृहद्भि दशनैः दन्तैः, उत्सादिततटा उत्सादित विनाशित तट कूलं ये ते, श्यामा—कृष्णवर्णाः, सिन्दूरशोणाः—सिन्दूरे शोणा रक्तवर्णा, शतश—शतेन शतेन, गजपतयः—गजेन्द्राः, तुङ्गकूल—तुङ्गम् उन्नतम् कूलम् तटम् यस्य तादृश, प्रस्यन्दिसलिलम्—प्रस्यन्दि प्रवहत् सलिल जलं यस्य तथाविध, कल्लोलमुखर—कल्लोलै वीचिभि मुखर गर्जन्त, स्रोत खातावसीदत्तट—स्रोतसा प्रवाहेण खातं विशीर्णम् अतएव अवसीदत् पतत् तटं तीरं यम्य तथाविध, श्यामोपकण्ठद्रुम—श्यामा नीला उपकण्ठे प्रान्ते स्थिता द्रुमा वृक्षा यस्य तादृश, शोणम्—एतदाख्यनदविशेषम्, पास्यन्ति—पानेन शोषयिष्यन्ति ॥ १६ ॥

हिन्दी अनुवाद—मलयकेतु—अमात्य ! यदि आप ऐसा आक्रमण का समय देख रहे हैं तो क्यों बैठा जाय ? देखिए—

मेरे अत्यन्त ऊँचे, टपकते हुए मदजल वाले, भ्रमरों से शब्दायमान, विशाल दाँतों से तटों को उखाड़ने वाले, कृष्णवर्ण और सिन्दूर से लाल सैकड़ों गजराज ऊँचे कगार वाले, बहते हुए जल वाले, तरंगों से शब्दायमान, प्रवाह से टूटकर गिरते हुए तट वाले और किनारे पर स्थित काले वृक्ष वाले शोण नामक नद को पियेंगे ॥ १६ ॥

टिप्पणी—आस्यते—इसका 'अस्माभि' लुप्त है। उत्तुङ्गा—उच्छ्रिता तुङ्गेभ्य प्रादितत्०। यह 'गजपतय' का विशेषण है। श्यामोपकण्ठद्रुमम्—उपगत कण्ठम् उपकण्ठ । तत्र द्रुमा सुप्त्सुपा स० । श्यामा उपकण्ठद्रुमा कर्मधारय स० । श्लोक में श्लेषानुप्राणित उपमा अलंकार और यथासंख्य अलंकार हैं, ओज गुण है, गौडी रीति है और सुवदना छन्द है । सुवदना का लक्षण यह है—'ज्ञेया सप्ताश्वषड्भिर्मरभनययुता म्लौगः सुवदना' ॥ १६ ॥

अपि च—