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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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तृतीयोऽङ्कः । २११

चले गए। यह जो तुम्हारा बचपन का सेवक राजसेन है, उसने भी तुम्हारी कृपा से अत्यधिक धन, हाथी और घोड़ों वाले विपुल ऐश्वर्य को एकाएक प्राप्त करके पुनः नष्ट होने के भय से मलयकेतु का आश्रय ले लिया। यह जो दूसरा सेनापति सिंहबल का छोटा भाई भागुरायण है, वह भी उस समय पर्वतक के साथ मित्रता होने तथा उस (-पर्वतक) के प्रेम के कारण 'तुम्हारे पिता को चाणक्य ने मरवाया है' इस प्रकार एकान्त मे मलयकेतु को डराकर भगा ले गया। तदनन्तर तुम्हारा अहित करने वाले चन्दनदास आदि के पकड़ लिये जाने पर अपने अपराध (के प्रकट हो जाने) की आशंका से भागकर (यह भागुरायण) मलयकेतु के आश्रय में चला गया। उस (मलयकेतु) ने भी 'यह मेरा प्राण-रक्षक है' इस प्रकार कृतज्ञता का अनुभव करते हुए अपने अव्यवहित अमात्य के पद पर (उसे) नियुक्त कर दिया। जो वे लोहिताक्ष और विजयवर्मा हैं, वे दोनों भी अत्यंत अभिमानी होने के कारण अपने बंधुओं को तुम्हारे द्वारा दिये जाने को सहन न करते हुए मलयकेतु के आश्रित हो गए—ये है इनकी विरक्ति के कारण।

टिप्पणी—अपराग—विरक्ति। अप √रञ्ज् + घञ् भावे। स्त्रीमद्यमृगयाशीलो—मृगयनम् इति √मृग (अदन्त चुरादि) + णिच् स्वार्थे + श भावे = मृगया = शिकार। स्त्री च मद्यञ्च मृगया च इति स्त्रीमद्यमृगयाः। ताः शीलयतः इति स्त्रीमद्यमृगयो √शील् + णिच् स्वार्थे + ण कर्तरि। स्वजीवनमात्रेणैव—जीवति अनेन इति √जीव् + ल्युट्करणे = जीवनम् = जीविका। स्वयोः जीवनम् तदेव स्वजीवनमात्रम् मयूरव्यंसकादि स०, तेन करणे तृतीया। स्वेन स्वेनाधिकारेण—अपने-अपने अधिकार से अर्थात् जिस पद से हटाये गये थे वही पद मलयकेतु के यहाँ प्राप्त करके। अत्यन्तलुब्धप्रकृती—अत्यन्तम् लुब्धा प्रकृतिः ययोः तादृशो। तत्र काले—कुसुमंपुर मे घेरा डालने के समय। स्वदोषाशङ्कया—स्वस्य दोषः, तस्मात् आशङ्का सुप्सुपा स०, तया हेतौ तृतीया। प्राणरक्षकः—प्राणानां रक्षकः 'याजकादिभिश्च' इति समासः, अथवा शेषषष्ठ्या समासः, अथवा प्राणान् रक्षति इति प्राण √रक्ष् + अण् कर्तरि = प्राणरक्षः। ततः स्वार्थे कन्। आत्मनोजनन्तरम्—अविद्यमानमन्तरमस्य अनन्तरम्। आत्मनः स्वस्य राजपदस्य अनन्तरम् अदूरम् अमात्यपदम्। ग्राहितः—√ग्रह् + णिच् + क्त। स्वदायादेभ्यः—√दा + घञ् कर्मणि दायः।