मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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संस्कृत नाटकों के विकास सम्बन्धी उपर्युक्त विवरण मे यह स्पष्ट हो जाता है कि संस्कृत-नाटकों का प्रारम्भ वैदिक काल में ही किसी न किसी अंश में हो गया था। धार्मिक उत्सवों से भी उसे प्रेरणा मिली। शनैः-शनैः नाटकों का विकास होता गया तथा पतञ्जलि के समय तक उसका पूर्ण विकसित स्वरूप जनता के समक्ष आ गया। हाँ, इतना अवश्य है कि महाभाष्य में वर्णित नाटक आज हमे उपलब्ध नही है।
नाटककार विशाखदत्त का काल और जीवनवृत्त
काल तथा जीवनवृत्त जानने के दो प्रमुख साधन— किसी नाटककार अथवा कवि के काल और जीवनवृत्त को जानने के दो प्रकार के प्रमुख साधन हुआ करते हैं :— (१) अन्तःसाक्ष्य— अर्थात् नाटककार अथवा कवि ने अपनी कृतियो में अपने बारे मे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से क्या लिखा है? (२) बहिःसाक्ष्य— अर्थात् कवि अथवा नाटककार के समकालीन अथवा परवर्त्ती विद्वानों आदि ने उसके सम्बन्ध में क्या-क्या लिखा है। इन दोनो प्रकार के साधनो मे अन्तःसाक्ष्य अधिक प्रामाणिक हुआ करता है। पहले हम प्रथम साधन के आधार पर विचार करेगे।
अन्तःसाक्ष्य की दृष्टि से विशाखदत्त ने भी महाकवि भास तथा कालिदास की ही भांति अपने सम्बन्ध मे कुछ भी न लिखना ही उचित समझा है। 'नाटक' महान् हुआ करता है, नाटककार नही; इस प्राचीन धारणा से विशाखदत्त पूर्णतया प्रभावित थे। नाटककार की दृष्टि से नाटक की प्रस्तावना में उन्होने मात्र यही लिखा है :—
“आज्ञापितोऽस्मि परिषदा यथा--अद्य त्वया सामन्तवटेश्वरदत्त-पौत्रस्य महाराजभास्करदत्तसूनोः कवेर्विशाखदत्तस्य कृतिराभिनवं मुद्राराक्षसं नाम नाटकं नाटयितव्यमिति।”
प्रस्तावना के उपर्युक्त अंश से केवल यही ज्ञात हो पाता है कि लेखक का नाम विशाखदत्त है! कुछ हस्तलिखित प्रतियों में 'विशाखदेव' नाम भी मिलता है। और वह सामन्त वटेश्वरदत्त के पौत्र तथा महाराज भास्करदत्त के पुत्र हैं अर्थात् इनके पिता का नाम महाराज भास्करदत्त तथा पितामह का नाम सामन्त