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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

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DevanagariSanskritpublished488 pages

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नामक आचार्यों द्वारा निर्मित नट-सूत्रों का विवरण प्राप्त होता है । पाणिनि का समय ईसा से लगभग ७०० वर्ष पूर्व माना गया है। अत यह मानना उचित ही है कि ईसा से ७०० वर्ष पूर्व तक नाटकों का इतना प्रचार हो गया था कि नटों की शिक्षा के निमित्त स्वतन्त्र सूत्रों की भी रचना की जाने लगी थी ।

इसके पश्चात् हमें पतंजलि मुनि द्वारा रचित 'महाभाष्य' देखने को मिलता है । इस महाभाष्य में कुछ प्रमाण ऐसे भी मिले हैं कि जिनके आधार पर नाटकों का रंगभूमि पर प्रयोग किये जाने का प्रमाण भी मिल जाता है। महाभाष्य में आया है —

“ये तावदेते शोभनिका (सौभिका) नामैते, प्रत्यक्षं कंसं घातयन्ति, प्रत्यक्षं च बलिं बन्धयन्ति इति । अतश्च सत व्यामिश्रा हि दृश्यन्ते, केचिद् कंसभक्ता भवन्ति केचित् वासुदेवभक्ता ।” इत्यादि

महाभाष्य ३।२।१११॥

इस उद्धरण में “कंस घातयति” और “बलिं बन्धयन्ति” में प्रयुक्त वर्तमानकाल की क्रिया का समाधान करते हुये भाष्यकार ने उन नटों (शोभनिकों) का उल्लेख किया है जो प्रत्यक्ष रूप से सभी के समक्ष कंस को मारते तथा बलि को बांधते हैं । इससे स्पष्ट हो जाता है कि पतञ्जलि के समय में 'कंसवध' और 'बलिबन्ध' नामक नाटकों का अभिनय हुआ था । आगे चलकर इन नाटकों के अभिनय-प्रकार का भी सूक्ष्म वर्णन महाभाष्य में इसी प्रसंग में मिलता है :—

“वर्णान्यत्वं खलु पुष्यन्ति । केचिद्रक्तमुखा भवन्ति, केचित् कालमुखा ।” महाभाष्य ३।२।१११॥

इसमें बतलाया गया है कि 'कंसवध' नामक नाटक में कंस के भक्त तो अपना मुख काला रंगकर अभिनय किया करते थे तथा कृष्ण के भक्त अपने मुखों को लाल रंग में रंग कर ।

महाभाष्य सम्बन्धी उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि पतञ्जलि के काल तक नाटकों का अभिनय जन साधारण के मनोरञ्जन के लिये एक उत्तम तथा सर्वप्रिय साधन बन चुका था ।