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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 269 of 488

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Page 269
१८२मुद्राराक्षसम्

**अन्वय—**यथा कृतागा कौटिल्य भुजग इव नगरात् निर्याय नन्दान् हत्वा मौर्यवृषल नृपतिम् अकरोत् तथा अह मौर्यन्दो श्रियम् अपहरामि इति कृतधी एष मद्बुद्धे प्रभावम् अतिशयितु व्यवसित ॥११॥

**व्याख्या—**यथा—येन प्रकारेण, कृतागा—कृतम् आचरितम् आग अपराध यस्मिन् तादृश, कौटिल्य—चाणक्य, भुजग इव—सर्प इव, नगरात्—कुसुमपुरात्, निर्याय—निःसृत्य, नन्दान्—एतदाख्यनृपतीन्, हत्वा—विनाश्य, मौर्यवृषल—चन्द्रगुप्तम्, नृपतिम्—राजानम्, अकरोत्—व्यदधात्, तथा—तेन प्रकारेण, अह—राक्षस, मौर्यन्दो—चन्द्रगुप्तस्य, श्रियम्—राज-लक्ष्मीम्, अपहरामि—अपनयामि, इति—इत्थम्, कृतधी—कृता कल्पिता धी बुद्धि येन तादृश कृतसङ्कल्प इत्यर्थ, एष—राक्षस, मद्बुद्धे—मदीयाया, मते, प्रभावम्—प्रकर्षम्, अतिशयितुम्—अतिवर्तितुम्, व्यवसित—समुद्यत ( अस्ति ) ॥ ११ ॥

**हिन्दी अनुवाद—**जिस प्रकार अपराध किये जाने पर चाणक्य ने सांप की तरह नगर से बाहर जाकर नन्दो का विनाश करके चन्द्रगुप्त को राजा बना दिया उसी प्रकार मैं चन्द्रगुप्त की लक्ष्मी का अपहरण कर लूंगा—ऐसा निश्चय करने वाला यह ( राक्षस ) मेरी बुद्धि के प्रभाव को नीचा दिखाने के लिए प्रयत्नशील है ॥ ११ ॥

**टिप्पणी—**कृतगा—जिसका अनिष्ट किया गया हो। भुजग इव—सांप की तरह। भुजेन कुटिलगत्या गच्छतीति भुज् √गम् + कतरि = भुजग, खच्प्रत्यये तु भुजङ्गम। जैसे सांप आघात पहुँचाने वाले से समय पाकर बदला ले लेता है, उसी तरह चाणक्य ने भी अपने अपमानकर्ता नन्द से बदला लिया था। इसीलिए यहाँ भुजग की उपमा दी गई है। अतिशयितुम्—अति क्रमण करने के लिए। अति √शी + तुमुन्। यद्यपि शी धातु अकर्मक है, किन्तु यहाँ उपसर्ग के कारण सकर्मक हो गई है। व्यवसित—उद्यत, कटिबद्ध। वि-अव √सो + क्त कर्तरि। इसका कर्ता 'एष' है, जो राक्षस के लिए आया है। इस श्लोक में उपमा अलकार है और और शिखरिणी छन्द है। शिखरिणी का लक्षण १,१३ मे देखिए ॥ ११ ॥

[प्रत्यक्षवदाकाशे लक्ष्यं बद्ध्वा] राक्षस ! राक्षस ! विरम्यतामस्माद्-दुर्व्यवसितात् ।