Skip to content
SarvaKosh
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 221 of 488

Read in context
Page 221

१३० मुद्राराक्षसम्

पुत्राव, कुमारे, मलयकेतौ, अपक्रान्ते—पलायिते, पर्वतकभ्रातरि—पर्वतकसहोदरे, वैरोचके, विश्वासिते—आश्वासिते च, चन्द्रगुप्तस्य—मौर्यस्य, नन्दभवनप्रवेशे—नन्दभूपगृहमन्निवेशे, प्रकाशिते—प्रख्यापिते च, चाणक्यहतकेन, आहूय—आकार्य, सर्वे—ममे, कुसुमपुरनिवासिन —पाटलिपुत्रवास्तब्या , सूत्रधारा —शिल्पिन , अभिहिता —कथिता , सावत्सरिकवचनात्—दैवज्ञवाक्यात्, अद्यैव—अस्मिन्नेव, अर्धरात्रसमये—निशार्धसमये, एव, चन्द्रगुप्तस्य, नन्दभवनप्रवेश —नन्दगृह-सन्निवेश , अभिमत —अभीष्ट , भविष्यति ।, तत —तदनन्तर, प्रथमद्वारात् प्रभृति—पूर्वद्वारमारम्य, राजभवन—राजप्रासाद , सज्जीक्रियताम्—सम्वाग्युक्त विधीयताम् । तत —तत्पश्चात्, सूत्रधारे , अभिहितम्—कथितम्, आर्य—पूज्य, देवस्य—महाराजस्य, चन्द्रगुप्तस्य, प्रथममेव—प्रागेव, नन्दभवनप्रवेशम्—नन्द-नृपगृहमन्निवेशम्, उपलभ्य—ज्ञात्वा, सूत्रधारेण—शिल्पिना, दारुवर्मणा—तन्नाम्नेन, कनकनोरण्यान्यादिभि —कनकस्य सुवर्णस्य तोरण बहिर्द्वारं तस्य चास सन्निवेश स आदि येषा तै , मस्कारविशेषे —यूपलोपरि बहिर्द्वारपातनोग्रो-गात्मनेरित्यथ , प्रथमराजद्वारम्—पूर्वनृपद्वारम्, मस्कृतम्—सत्कारास्पदवृतम् । इदानीम्—अधुना, अस्माभि —शिल्पिभि , अभ्यन्तरे—अन्तर्गले, सम्कार —परिष्कार , विधेय —कर्तव्य । तत —तदनन्तरम्, अनादिष्टेनेव-आदेशमप्राप्तवतैव, दारुवर्मणा, राजभवनद्वार, सम्कृतम्, इति—अस्माद्धेतो , परितुष्टेन—सन्तुष्टेन इव, चाणक्यवटुना—विष्णुगुप्तेन, सुचिर—बहुकाल, दारुवमरण , दाक्ष्य—निपुणताम्, अभिनन्द्य—प्रशम्य, अभिहितम्—'दारुवर्मन् ! अन्य—दाक्ष्यस्य, अनुरूप—सदृश, फलम्, अचिरात्—शीघ्रम्, अधिगमिष्यसि—प्राप्स्यसि' ।

हिन्दी अनुवाद—विराधगुप्त—अमात्य ! इसमे भाग्य की मनमानी है ।

राक्षस—तब तब ?

विराधगुप्त—तब पिता की हत्या से घबड़ाकर कुमार मलयकेतु के कुसुमपुर से भाग जाने पर, पर्वतक के भाई वैरोचक को विश्वास दिला दिये जाने पर और चन्द्रगुप्त के नन्द के महल में प्रवेश करने की घोषणा कर दी जाने पर दुष्ट चाणक्य ने कुसुमपुर के रहने वाले सभी कारीगरो को बुलाकर कहा कि ज्योतिषियो के कहने के अनुसार आज ही आधी रात के समय चन्द्रगुप्त का नन्द के भवन में प्रवेश करना इष्ट होगा । इसलिए प्रथम द्वार से लेकर राज-भवन को सुसज्जित