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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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Page 210

द्वितीयोऽङ्कः ११५

अज्ज ! को तुमं ? ( यदार्य आज्ञापयतीति । ननु आर्य ! कस्त्वम् ) ?

आहितुण्डिकः—भद्द ! अहं क्खु आहितुण्डिओ जिण्णविसो णाम । इच्छामि अमच्चरक्खसस्स पुरदो सप्पेहि खेलिदुं । ( भद्र ! अहं खल्वाहितुण्डिको जीर्णविषो नाम । इच्छाम्यमात्यराक्षसस्य पुरतः सर्पैः खेलितुम् । )

प्रियंवदकः—चिट्ठ, जाव अमच्चस्स णिवेदेमि । [ राक्षसमुपसृत्य ] अज्ज एसो क्खु सप्पोवजीवी इच्छदि सप्पेहिं अमच्चस्स पुरदो खेलिदुं । (तिष्ठ, यावदमात्यस्य निवेदयामि । आर्य ! एष खलु सर्पोपजीवी इच्छति सर्पैरमात्यस्य पुरतः खेलितुम् ।)

हिन्दी अनुवाद—कंचुकी—अमात्य ! आपके नेतृत्व में कुमार ( मलयकेतु ) के लिए यह सुलभ है । इसलिए कुमार का यह पहला स्नेह ( -सिक्त उपहार, ) स्वीकार कीजिए ।

राक्षस—आर्य ! कुमार के समान आपकी भी आज्ञा टालने योग्य नहीं है । इसलिए कुमार की आज्ञा मान लेता हूँ ।

कंचुकी—[ अभिनय के साथ आभूषणों को पहना कर ] आपका कल्याण हो । मैं जाता हूँ ।

राक्षस—आर्य ! अभिवादन करता हूँ [ कंचुकी चला जाता है । ] प्रियंवदक ! पता करो, यह कौन मुझ से मिलने के लिए द्वार पर खड़ा है ।

प्रियंवदक—आर्य की जो आज्ञा । [ घूमकर और सँपेरे को देखकर ] आर्य आप कौन हैं ?

आहितुण्डिक—भद्र ! मै जीर्णविष नाम का सँपेरा हूँ । अमात्य राक्षस के आगे साँपों से खेलना चाहता हूँ ।

प्रियंवदक—ठहरो, जबतक मै अमात्य से निवेदन करता हूँ । [ राक्षस के पास जाकर ] आर्य ! यह सँपेरा अमात्य के सामने साँपों से खेलना चाहता है ।

टिप्पणी—त्वयि नेतरि—अत्र 'यस्य च भावेन भावलक्षणम्' इति सूत्रेण सप्तमी । प्रतिमान्यताम्—स्वीक्रियताम् । प्रणयः—प्रार्थना अथवा लाक्षणिक अर्थ—प्रेमोपहार । प्रकर्षेण नीयते अनेन इति प्र√नी+अच् करणे = प्रणयः । यह 'प्रतिमान्यताम्' का उक्त कर्म है । अनतिक्रमणीयवचनः