Skip to content
SarvaKosh
मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 186 of 488

Read in context
Page 186

प्रथमोऽङ्कः ८७

व्याख्या—इदानीम्—अधुना, शिविना—तन्नामकोशीनरदेशाधिपेन, विना—अन्तरा, कः, जनः—लोकः, परसंवेदने—परस्य परकीयर्थस्य संवेदने समर्पणे (कृते सति ) सुलभेषु—सुप्राप्येषु, अर्थलाभेषु—राजप्रसादादिरूपेषु अभीष्टसिद्ध्यादिषु, इदम्—अन्यकलत्रसंगोपनात्मकं, दुष्करं—कठिनं, ( कर्म ) कुर्यात्—आचरेत् ॥२४॥

हिन्दी अनुवाद—चाणक्य—चन्दनदास ! क्या यह तुम्हारा निश्चय है ?

चन्दनदास—हाँ, यह मेरा दृढ निश्चय है ।

चाणक्य—[ मन में ] वाह चन्दनदास ! वाह ।

इस समय ( सत्ययुग के राजा ) शिवि को छोड कर कौन व्यक्ति दूसरे की वस्तु को समर्पित कर देने से अर्थ-लाभ होने पर यह कठिन कर्म करे ॥२४॥

टिप्पणी—बाढम्—यह स्वीकारार्थक अव्यय है । शिविना—अत्र 'पृथग्विनानाना'—इति विनायोगे तृतीया । यहाँ पौराणिक कथा यह है कि एक बार सत्ययुग में बाज का रूप धारण किये हुए धर्म से कपोतरूपधारी शरणागत इन्द्र की रक्षा करने के लिए राजा शिवि ने अपना शरीर काट-काट कर बाज को दे दिया था । इस पद्य में व्यतिरेक अलंकार है; क्योकि यहाँ शिवि ने सत्ययुग में दुष्कर कार्य किया था और तुम इस समय पापी कलियुग में ऐसा कर रहे हो—इस भाव के कारण उपमानभूत शिवि की अपेक्षा उपमेय चन्दनदास के आधिक्य का वर्णन हुआ है । इसमे प्रसादगुण है, वैदर्भी रीति है और अनुष्टुप् छन्द है । लक्षण १, ३ में देखिए ॥२४॥

[ प्रकाशम् ] चन्दनदास ! एष ते निश्चयः ?

चन्दनदासः—बाढम् ।

चाणक्यः—[ सक्रोधम [ दुरात्मन् ! तिष्ठ दुष्टवणिक् ! अनुभूयतां तर्हि नरपतिक्रोधः ।

चन्दनदासः—[ बाहू प्रसार्य ] सज्जोज्हि । अणुचिट्ठदु अज्जो अत्तणो अहिआरसरिसम् । ( सज्जॊऽस्मि । अनुतिष्ठतु आर्यः आत्मनोऽधिकारसदृशम् । )