मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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Read in context८६ मुद्राराक्षसम्
यह भी राजद्रोही कायस्थ शकटदास शूली पर चढाने के लिए ले जाया जा रहा है।
चाणक्य—अपने कर्म का फल भोगे। सेठजी ! इस प्रकार अनिष्ट करने वालो के प्रति कठोर दण्ड देने वाला यह राजा आपका राक्षस के परिवार को छिपाना सहन नहीं करेगा। इसलिए दूसरे के परिवार से अपने परिवार और जीवन को बचाओ।
चन्दनदास—आर्य ! मुझे क्या भय दिखा रहे हैं ? घर मे अमात्य राक्षस के परिवार के रहने पर भी मैं नहीं दूंगा, फिर न रहने पर तो कहना ही क्या।
टिप्पणी—राजापथ्यकारी—राजा का अनिष्ट करने वाला । पथोऽनपेतं पथ्यम् । पथिन्+यत् 'धर्मपथ्यर्थन्यायादनपेते' इत्यनेन । न पथ्यम् अपथ्यम् नञ्तत्० । राज्ञ अपथ्यम् षष्ठीतत्० । तत् करोति तच्छील इति राजा-पथ्य√कृ+णिनि । निर्वास्यते—निष्कासित किया जा रहा है। निर्√वस्+णिच्+लट्—ते कर्मणि । प्राचीन काल मे सन्यासी तथा ब्राह्मण को मृत्युदंड के बदले केवल निर्वासन का दंड ( देश निकाला ) दिया जाता था— 'वपनं द्रविणादानं स्थानान्निष्क्रामणं तथा । एष हि ब्रह्मबन्धूनां वधो नान्योऽस्ति दैहिक ॥' प्रमाद --अनुग्रह । 'प्रमादोऽनुग्रहे वाव्यगुणाम्बाम्व्यविपत्तिषु' इति मेदनी । किं मे भय दर्शयसि—अत्र 'मे' इति चतुर्थ्यन्त पदम् । 'दृशे सर्वत्र' इति भाष्यकृदुक्त्या 'पत्य दर्शयन्' इत्यत्र इव चतुर्थी । समर्पयामि—अत्र भविष्यत्सामीप्ये लट् ।
चाणक्य —चन्दनदास ! एष ते निश्चय ?
चन्दनदास —वाढ । एसो धीरो मे णिच्छओ । ( बाढमेष धीरो मे निश्चय । )
चाणक्य —[ स्वगतम् ] साधु चन्दनदास ! साधु ।
सुलभेष्प्वर्थलाभेषु परसंवेदने जन ।
क इद दुष्कर कुर्यादिदानीं शिविना विना ॥२४॥
अन्वय —इदानीं शिविना विना क जन परसंवेदने सुलभेषु अर्थलाभेषु इद दुष्कर कुर्यात् ॥२४॥