मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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Read in context•प्रथमोऽङ्कः•
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शीर्षे—शिरसि, सर्पः—अहिः, समाविष्टः—दंशनार्थं समु पागतः (इति यादृशम् एतदपि तादृशमेव ) ॥२२॥
**हिन्दी अनुवाद—चन्दनदास—**आर्य ! मैं निवेदन कर रहा हूँ कि उस समय हमारे घर मे अमात्य राक्षस का परिवार था ।
**चाणक्य—**अव इस समय कहाँ गया ?
**चन्दनदास—**नही जानता हूँ ।
चाणक्य—[ मुस्कुराकर ] क्यों नहीं जानते हैं ? सेठ जी ! सिर पर भय ओर उससे बचने का उपाय अत्यन्त दूर !
चन्दनदास—[ मन में ]
यह क्या आ पड़ा ? ( यह तो ऐसा ही है कि जैसा किसी परदेशी के सिर के ) ऊपर तो मेघों का गंभीर गर्जन हो रहा है और प्रिया पड़ी है दूर में ( अथवा ) साँप सिर पर चढ़ आया है और दिव्य ओषधियां हिमालय पर हैं ॥२२॥
**टिप्पणी—शिरसि भयम्......**यहाँ तात्पर्य यह है कि आपको भय है राजा से, जो बिलकुल नजदीक है और प्रतीकार की आशा है राक्षस से, जो अत्यन्त दूर है । यहाँ अप्रस्तुत सिर पर भय के प्रतिपादन से प्रस्तुत समीपवर्ती राजदण्डरूप अर्थ के वोध होने के कारण अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार है । उपरि घनं घनरटितं......इस पद्य में अप्रस्तुतप्रशंसा अलंकार दृष्टान्त अलंकार से संकीर्ण है ॥२२॥
**चाणक्यः—**अन्यच्च । नन्दमिव विष्णुगुप्तः—[ इत्यर्धोक्ते लज्जां नाटयित्वा ] चन्द्रगुप्तममात्यराक्षसः समुच्छेत्स्यतीति मैवं मंस्थाः ।
पश्य—
विक्रान्तैर्नयशालिभिः सुसचिवैः श्रीवक्रणासादिभिः
नन्दे जीवति या तदा न गमिता स्थैर्यं चलन्ती मुहुः ।
तामेकत्वमुपागतां द्युतिमिव प्रह्लादयन्ती जगत् ।
कश्चन्द्रादिव चन्द्रगुप्तनृपतेः कर्तुं व्यवस्येत् पृथक् ॥२३॥
मु० रा०—६