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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 177 of 488

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Page 177

७८ मुद्राराक्षसम्

चन्दनदास —अज्ज ! अलीअ एदं । केणावि अणभिण्णेण अज्जस्स णिवेदितम् । ( आर्य ! अलोकमेतत् । केनाप्यनभिज्ञेन आर्यस्य निवेदितम् । )

चाणक्य —भो श्रेष्ठिन् ! अलमाशङ्कया । भीता पूर्वराजपुरुषा पौराणामनिच्छतामपि गृहेषु गृहजन निक्षिप्य देशान्तर व्रजन्ति । ततस्तत्प्रच्छादन दोषमुत्पादयति ।

चन्दनदास —एव णेदम् । तम्मि समए आमि अह्मघरे अमच्चरक्खसस्म घरअणो त्ति । ( एव नु इदम् । तस्मिन् समये आसीदस्मद्गृहे अमात्यराक्षसस्य गृहजन इति । )

चाणक्य —पूर्वमनृतमिदानीमासीदिति परस्परविरोधिनी वचने ।

चन्दनदास —एत्तिअ ज्जेव अत्थि मे वाआच्छलम् । ( एतावदेवास्ति मे वाक्छलम् ।)

चाणक्य —भो श्रेष्ठिन् ! चन्द्रगुप्ते राजनि अपरिग्रहश्छलानाम् । तत् समर्पय राक्षसस्य गृहजनम् । अच्छल भवतु भवत ।

हिन्दी अनुवाद—चाणक्य—सबसे पहले तो आप ही ( हैं ) ।

चन्दनदास—[ कानों को बन्द करके ] पाप शान्त हो, पाप शान्त हो । तिनको का आग से कैसा विरोध ?

चाणक्य—यह ऐसा विरोध है कि आप आज भी राजा के अहित करने वाले अमात्यराक्षस के परिवार को अपने घर मे लाकर रख रहे हैं ।

चन्दनदास—आर्य ! यह मिथ्या है । किसी अनजान ( व्यक्ति ) ने आप से कह दिया है ।

चाणक्य—सेठजी ! डरिए मत । डरे हुए पहले के राजसेवक न चाहते हुए भी नागरिकों के घरों म ( अपन ) परिवारों को रखकर दूसरे देश मे चले गए हैं । इसलिए उनको छिपाना अपराध ( उत्पन्न करता ) है ।

चन्दनदास—यह ऐसा है । ( कि ) उस समय हमारे घर मे अमात्यराक्षस का परिवार था ।