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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 175 of 488

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Page 175

७४ मुद्राराक्षसम्

चन्दनदास—[ स्वगतम् ] उपलक्खिदमणेण दुट्टेण किवि। ( उप-
लक्षितमनेन दुष्टेन किमपि । ) [प्रकाशम्] ज अज्जो आणवेदि त्ति।
(यदार्य आज्ञापयति ।)[उपविष्ट ।]

चाणक्य—भो श्रेष्ठिन् चन्दनदास ! अपि प्रचीयन्ते संव्यवहाराणां
वृद्धिलाभा ।

चन्दनदास—[स्वगतम्] अच्छादरो सकणीओ । ( अत्यादर शङ्क-
नीय । [प्रकाशम्] अह इं । अज्जस्स प्पसाएण अखण्डिदा मे वणिज्जा ।
( अथ किम् । आर्यस्य प्रसादेन अखण्डिता मे वणिज्या ।)

चाणक्य—न खलु चन्द्रगुप्तदोषा अतिक्रान्तपार्थिवगुणानधुना स्मा-
रयन्ति प्रकृती ?

चन्दनदास—[ कर्णौ विधाय ] सन्त पावम् । सारअणिसासमुग्गएण
विअ पुण्णिमाचन्देण चन्दसिरिणा अहिअ णन्दन्ति पकिदिओ । ( शान्तं
पापम् । शारदनिशासमुद्गतेनेव पूर्णमाचन्द्रेण चन्द्रश्रियाधिक नन्दन्ति
प्रकृतय ।)

हिन्दी अनुवाद—चन्दनदास—[प्रणाम करके] क्या आर्य नहीं जानते हैं
कि अनुचित सत्कार तिरस्कार से भी बढकर हृदय में दुःख उत्पन्न करता है ।
इसलिये यही उपयुक्त भूमि पर बैठ जाता हूँ ।

चाणक्य—सेठ जी ! नहीं, ऐसी बात नहीं है । हम जैसे ( व्यक्तियों )
के द्वारा आपका यह ( सत्कार करना ) उचित ही है। इसलिये आसन पर
ही बैठिय ।

चन्दनदास—[ मन में ] इस दुष्ट ने कुछ ताड़ लिया है । [ प्रकट ]
जो आर्य की आज्ञा ।

चाणक्य—सेठ चन्दनदास जी ! ( आपका ) व्यवसाय तो बढ़ती पर
है न ?

चन्दनदास—[ मन में ] बहुत आदर अनिष्टसूचक होता है। [ प्रकट ]
और क्या । आपकी कृपा से मेरा व्यवसाय निर्विघ्न चल रहा है ।