मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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Read in context२४ मुद्राराक्षसम्
चासौ भुजगी कर्मधारय स० । नन्दस्य कुलम्, तस्य कालभुजगी षष्ठीतत्०, ताम् । यह 'शिखाम्' का विशेषण है । कोपानल०—क्रोध रूपी अग्नि की अत्यन्त कृष्ण धूमलता ( के समान ) । बहुल नीला सुप्मुपा स० । बहुलनीला धूमलता कर्मधारय स० । कोप अनल इव इति कोपानल उपमित स० । तस्य बहुनील-धूमलता षष्ठीतत्०, ताम् । यह भी 'शिखाम्' का विशेषण है । अद्यापि—आज भी, अभी भी अर्थात् नन्दवश का विनाश करके मेरी प्रतिज्ञा पूरी हो चुकने के उपरान्त भी । बध्यमानाम्—बांधी जाती हुई । √ बन्ध् + लट् कर्मणि—शानच्, स्त्रिया टाप् = बध्यमाना, ताम् । यह 'शिखाम्' का विधेयात्मक विशेषण है । इस पद्य मे अश्लिष्टशब्दनिवन्धनमालारूप परम्परित रूपक अलङ्कार है और आर्या छन्द है । आर्या का लक्षण श्लोक ५ की टिप्पणी मे देखिए ॥ ६ ॥
अपि च—
उल्लङ्घयन् मम समुज्ज्वलत प्रताप
कोपस्य नन्दकुलकाननधूमकेतो ।
सद्य परात्मपरिमाणविवेकगूढ
क शालभेन विधिना लभता विनाशम् ॥ १० ॥
अन्वय—परात्मपरिमाणविवेकगूढ क मम समुज्ज्वलत नन्दकुलकानन धूमकेतो कोपस्य प्रतापम् उल्लङ्घयन् शालभेन विधिना सद्य विनाश लभताम् ॥१०॥
व्याख्या—परात्मपरिमाणविवेकगूढ—परस्य शत्रो आत्मन स्वस्य च यत् परिमाण तारतम्य तस्य विवेके विमर्शे मूढ मुग्धमति असमर्थ इति यावत्, क—जन , मम—मे, समुज्ज्वलत—दीप्यमानस्य, नन्दकुलकाननधूमकेतो—नन्दकुलम् नन्दवश एव कानन वन तस्य धूमकेतो दावाग्ने , कोपस्य—क्रोधस्य, प्रताप—प्रखरदाहम्, उल्लङ्घयन्—अतिक्रमिष्यन्, शालभेन विधिना—पतङ्गरीत्या, सद्य—झटिति, विनाश—क्षय, लभताम्—प्राप्नोतु ॥ १० ॥
हिन्दी अनुवाद—और भी—पराये और अपने वलाबल के विचार से शून्य (यह) कौन (है, जो) मेरे देदीप्यमान तथा नन्दवंश रूपी वन (को जलाने) के लिए अग्निरूप क्रोध की लपटो को लांघता हुआ पतंग की रीति से शीघ्र ही विनाश को प्राप्त हो (रहा है) ॥ १० ॥
टिप्पणी—परात्म०—शत्रु की और अपनी सामर्थ्य को पहचानने में