मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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Read in contextप्रथमोऽङ्कः | २३
को अवश्य ही वश में करना चाहिए। मयि स्थिते—अत्र 'षष्ठी चानादरे' इति सूत्रेण सप्तमी। जृम्भाविदारितमुखस्य—जँभाई लेने के कारण खोले हुए मुख वाले। जृम्भया विदारितं मुखं यस्य सः त्रिपदव्यधिकरणबहुव्रीहि स०, तस्य। यह ‘हरेः’ का विशेषण है। आस्वादित०—पिये गये गजराज के रक्त की लाली से रक्ताभ। द्वौ रदौ दन्तौ अस्य इति द्विरदः। तस्य शोणितम् षष्ठीतत्०। आस्वादितं द्विरदशोणितम् कर्मधारय स०। तेन शोणा शोभा यस्याः सा त्रिपद-व्यधि०, ताम्। यह ‘दंष्ट्राम्’ का विशेषण है। यहाँ चाणक्य हरि है और चन्द्रगुप्त की राज्य-श्री उसकी दंष्ट्रा है। इस पद्य में रूपकातिशयोक्ति अलंकार है और वसन्ततिलका छन्द है। उसका लक्षण यह है—‘ज्ञेयं वसन्ततिलकं तभजा जगौ गः’ ॥ ८ ॥
अपि च—
नन्दकुलकालभुजगीं कोपानलबहुलनीलधूमलताम् ।
अद्यापि बध्यमानां वध्यः को नेच्छति शिखां मे ॥ ६ ॥
अन्वय—वध्यः कः नन्दकुलकालभुजगी कोपानलबहुलनीलधूमलतां मे शिखाम् अद्यापि बध्यमानां न इच्छति ॥ ६ ॥
व्याख्या—वध्यः—हन्तुं योग्यः, कः—जनः, नन्दकुलकालभुजगीं—नन्द-कुलस्य नन्दवंशस्य कालभुजगी कृष्णसर्पिणीम् ( इव ), कोपानलबहुलनीलधूम-लतां—कोपः क्रोध एव अनलः अग्निः तस्य बहुलनीलाम् अतिकृष्णाम् ( ०बहुल-लोल० इति पाठभेदे तु बहुला घनीभूता चासौ लोला व्याप्तदिक् च या तथाभूताम् इति व्याख्येयम् ) धूमलताम् धूमसन्ततिम् ( इव ), मे—मम, शिखाम्, बध्यमानां—संयम्यमानां, न—नहि, इच्छति—वाञ्छति ॥ ६ ॥
हिन्दी अनुवाद—और भी—वध के योग्य ( यह ) कौन ( है, जो ) नन्दवंश की कालसर्पिणी और क्रोधाग्नि की अत्यन्त काली धूमरेखा ( के समान ) मेरी शिखा को अभी भी बँधती हुई ( देखना ) नहीं चाहता है ॥ ६ ॥
टिप्पणी—वध्यः—मार डालने योग्य। यहाँ वध्य मलयकेतु है, क्योंकि वही चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करना चाहता है। वधमर्हति इति वध्यः वध+य। अथवा √हन्+यत् वधादेशश्च 'हनो वा यद्वधश्च वक्तव्यः' इति वार्तिकेन। नन्दकुलकालभुजगीम्—नन्दवंश के लिए कालसर्पिणी ( के समान )। काली