Skip to content
SarvaKosh
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

by महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी

Source: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished804 pages

Page 670 of 804

Read in context
Page 670

६१६ मीमांसादर्शनम् [ सू०
भा० प्र० -- गावी, गोणी आदि एक अर्थ को कहने वाले अनेक शब्दों में एक साधु
है, और अन्य असाधु हैं। इस प्रसङ्ग में यह विचार्य है कि कौन शब्द साधु है एवं कौन
शब्द असाधु है—इसकी जानकारी किस प्रकार हो सकती है। इसी आशङ्का के उत्तर में
“तत्र तत्त्वम्” इत्यादि कहा गया है। कौन शब्द साधु है और कौन शब्द असाधु है—
इसका ज्ञान व्याकरण शास्त्र के अनुशीलनजनित संस्कार विशेष से होता है। सूत्र में
अभियोग विशेष से साधु शब्द के ज्ञान का निर्देश किया गया है। अभियोग शब्द का
अर्थ पटुत्व और विशेष शब्द का अर्थ लक्षण होता है। शब्द अनन्त है, अतः प्रत्येक शब्द
को लेकर साधुत्व और असाधुत्व की अवगति नहीं की जा सकती है। सभी शब्दों के
स्वरूप को असन्दिग्ध रूप में जानने का कोई लौकिक साधन भी नहीं है। किन्तु व्याक-
रणशास्त्र में ऐसे नियमों का उल्लेख किया गया है, जिससे एक पद का ज्ञान होने से
उसके समान अनेक पदों का ज्ञान सम्भव होता है। इसलिए व्याकरण शास्त्र के द्वारा
सभी शब्दों को अधीन किया जा सकता है, अतः व्याकरण का प्रामाण्य सभी के द्वारा
अवश्य ही ग्राह्य है। व्याकरण का प्रामाण्य होने से इस शास्त्र में जिन शब्दों को साधु के
रूप में निर्देश किया गया है—वे ही साधु शब्द के रूप में ग्राह्य हैं, अन्य असाधु या अप-
भ्रंश के रूप में त्याज्य हैं, अर्थात् यज्ञादि में व्यवहार के योग्य नहीं हैं, अतः शब्द का
साधुत्व सिद्ध नहीं है यह बात नहीं है।
इस प्रसङ्ग में वार्त्तिककार ने कहा है कि शब्द का साधुत्व प्रत्यक्ष आदि छ प्रमाणों
के आधार पर जाना जाता है। व्याकरण न श्रुतिमूलक है और न स्मृति ही है, अतः,
व्याकरण प्रमाण नहीं है, किन्तु यह कथन ठीक नहीं है, क्योंकि शब्द के प्रयोग की
व्यवस्था करना ही व्याकरण स्मृति का प्रयोजन है। इसीलिए कहा गया है—ब्राह्मण
म्लेच्छ शब्द=(अव्यक्त) नहीं कहे, अपशब्द का प्रयोग नहीं करे, यह अपशब्द ही म्लेच्छ=
अव्यक्त या असमीचीन उच्चारण है; इस प्रकार अपशब्द के प्रयोग का निषेध किया गया
है। “तस्माद् ब्राह्मणो न म्लेच्छितवै नापभाषितवै म्लेच्छोह वा यदेष अपशब्दः”। अथ
ते असुराः हेलयो हेलय इति कुर्वन्तः परावभूदुः” वे असुरगण “हे अरयः” हे अरिगण
इसके स्थान पर “हे अलयः” इस प्रकार का उच्चारण करने से पराजित हुए। इस
प्रकार के अर्थवाद वाक्य के रहने से श्रुति ने स्पष्ट ही कहा है कि व्याकरण के अनुसार
साधु शब्दों का प्रयोग करना उचित है। “तस्मादियं व्याकृता वागुच्यते” (तै० सं०
६।४।७।३) इसीलिए व्याकृत अर्थात् प्रकृति और प्रत्यय आदि से युक्त पद का प्रयोग कराया
गया है—इत्यादि श्रुति में स्पष्ट कहा गया है। अतः, व्याकरण का प्रामाण्य श्रुति से सिद्ध
है। व्याकरण साधु शब्द के प्रयोग का विधान करती है-यह स्मृति में भी कहा गया है।
सभी स्मृतियों में केवल यज्ञ आदि कर्मों का ही प्रतिपादन रहे—ऐसा कोई नियम नहीं
है। इसलिए व्याकरण भी स्मृति है और वेदमूलक है। वेद में व्याकरणावगत साधु
शब्द के प्रयोग की सूचना होने से व्याकरण के प्रामाण्य में कोई बाधा नहीं है।